पटना एमएलसी चुनाव में 6 हजार वोट खारिज, मगनी लाल मंडल ने मतों की गिनती पर उठाए सवाल

पटना, 28 अक्टूबर . राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के वरिष्ठ नेता और बिहार प्रदेश अध्यक्ष मगनी लाल मंडल ने बुधवार को आरोप लगाया कि पटना ग्रेजुएट्स निर्वाचन क्षेत्र में उनकी पार्टी के उम्मीदवार के पक्ष में डाले गए लगभग 6 हजार वोटों को खारिज कर दिया गया, ताकि जदयू उम्मीदवार नीरज कुमार को फायदा पहुंचाया जा सके. उन्होंने आरोप लगाया कि मतगणना में हुई गड़बड़ियों ने बिहार विधान परिषद चुनाव के नतीजों को प्रभावित किया है.

समाचार एजेंसी से बातचीत में मंडल ने दावा किया कि उनकी पार्टी के उम्मीदवार को सबसे ज्यादा वोट मिले थे, लेकिन नीरज कुमार की जीत पक्की करने के लिए बड़ी संख्या में मतपत्रों को खारिज कर दिया गया. नतीजों की समीक्षा करने के बाद पार्टी तय करेगी कि आगे अपील करनी है या नहीं.

उन्होंने कहा कि तकनीकी आधार पर हमारे लगभग 6,100 वोट खारिज कर दिए गए, क्योंकि वे चाहते थे कि नीतीश कुमार जी के उम्मीदवार, नीरज, जीतें. हमें सबसे ज्यादा वोट मिले थे. वोटों की गिनती में भी गड़बड़ी हुई है.

उन्होंने कहा कि चुनावों में मतपत्रों के इस्तेमाल का मतलब यह है कि जब तक सभी वोटों और वरीयता राउंड की गिनती पूरी नहीं हो जाती, तब तक नतीजे अनिश्चित रह सकते हैं. उन्होंने बताया कि ऐसे चुनावों में, दूसरी, तीसरी और चौथी वरीयता की गिनती के दौरान उम्मीदवारों की स्थिति में बदलाव आ सकता है.

मंडल ने कहा कि पूरे नतीजों की समीक्षा करने के बाद, हम संभावित अपील को लेकर एक रणनीति बनाएंगे.

उन्होंने एमएलसी चुनाव में ‘इंडिया’ गठबंधन को मनमुताबिक नतीजे न मिलने के लिए कांग्रेस पार्टी के रवैये को जिम्मेदार ठहराया. उन्होंने आरोप लगाया कि यह मुकाबला गठबंधन के साथियों के बीच फ्रेंडली फाइट में बदल गया. समय रहते तालमेल न बिठा पाने और संयुक्त उम्मीदवारों को तय न कर पाने की वजह से विपक्ष की संभावनाएं कमजोर हो गईं.

मंडल ने कहा कि कांग्रेस नेता मदन मोहन झा की हार एक बड़ा झटका है और उन्होंने इस नतीजे पर दुख जताया. उन्होंने आगे कहा कि गठबंधन ने पहले से किसी साझा उम्मीदवार की घोषणा नहीं की थी, जो उनकी चुनावी रणनीति में स्पष्टता की कमी को दर्शाता है.

कर्नाटक में कांग्रेस की राजनीतिक रणनीति पर टिप्पणी करते हुए, मंडल ने कहा कि पार्टी का पूरा ध्यान मतदाता सूची के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (एसआईआर) पर केंद्रित लग रहा था, जबकि बेरोजगारी और महंगाई जैसे मुद्दों पर भी ध्यान देने की जरूरत थी.

उन्होंने तर्क दिया कि राजनीतिक आंदोलनों का एक मुख्य उद्देश्य तो हो सकता है, लेकिन उन्हें जनता से जुड़ी व्यापक चिंताओं को भी उठाना चाहिए. किसी आंदोलन का केवल एक ही मुद्दा नहीं हो सकता. उसका एक मुख्य लक्ष्य तो हो सकता है, लेकिन साथ ही अन्य मुद्दों को भी उठाया जाना चाहिए.

इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) और मतपत्रों को लेकर चल रही बहस पर मंडल ने कहा कि इनमें से किसी भी प्रणाली को एक अचूक समाधान नहीं माना जाना चाहिए. उन्होंने माना कि ईवीएम में तकनीकी खराबी आ सकती है, लेकिन उनका मानना ​​था कि ऐसी कमियों को सुधारा जाना चाहिए, न कि पूरी तरह से वापस मतपत्रों (बैलेट पेपर) की व्यवस्था पर लौट जाना चाहिए.

उन्होंने कहा कि ईवीएम में दिक्कतें, यानी तकनीकी समस्याएं, हो सकती हैं. यह हमारी पार्टी का रुख है और मैं इससे सहमत हूं. हालांकि, बैलेट (मतपत्र) भी कोई पक्का समाधान नहीं है, क्योंकि इसमें अल्पसंख्यक वर्गों के वोट दब सकते हैं.

मंडल ने आगे तर्क दिया कि बैलेट से होने वाले चुनाव अल्पसंख्यकों के वोटिंग अधिकारों की ठीक से रक्षा नहीं कर पाएंगे. तकनीकी तरक्की के साथ चुनावी प्रणालियों में भी बदलाव आना चाहिए.

विरोध-प्रदर्शनों और राजनीतिक लामबंदी के खिलाफ हो रहे विरोध का जिक्र करते हुए मंडल ने आरोप लगाया कि इन आंदोलनों के विरोध का इस्तेमाल लोकतांत्रिक आजादी को सीमित करने के बहाने के तौर पर किया जा रहा है. अपनी जवानी के दिनों में विरोध-प्रदर्शनों में शामिल होने के अपने अनुभव को याद करते हुए, उन्होंने कहा कि मौजूदा विरोध इसलिए खास है क्योंकि इसमें कारोबारी लोग भी अपनी आवाज उठा रहे हैं.

उन्होंने आरोप लगाया कि विरोध-प्रदर्शनों का विरोध करने वाले कुछ लोग भाजपा के इशारे पर काम कर रहे थे. उन्होंने प्रदर्शनों के खिलाफ दिए जा रहे तर्कों को असहमति को दबाने के लिए रचा गया एक दिखावा बताया.

पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा ‘सीमित लोकतंत्र’ और ‘सीमित न्यायपालिका’ की गई बातों का जिक्र करते हुए, मंडल ने कहा कि अब उस ‘सीमितता’ को लागू करने का समय आ गया है. उन्होंने आगे कहा कि लोकतंत्र की गारंटी केवल वही दे सकता है जो सत्ता में हो. लोकतंत्र के विचार का बखान करना और वास्तव में लोकतंत्र का पालन करना, दोनों अलग-अलग बातें हैं.

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पीएसके