तस्लीमा नसरीन की आगामी कोलकाता यात्रा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए कसौटी

नई दिल्ली, 15 जुलाई . लेखिका तस्लीमा नसरीन की आगामी कोलकाता यात्रा राजनीतिक बहस का विषय बन गई है, क्योंकि यह पता चला है कि कट्टरपंथियों के लंबे समय से निशाने पर रही यह लेखिका एक अगस्त को एक कट्टरवाद-विरोधी साहित्यिक कार्यक्रम में भाग ले रही हैं.

पिछले साल मार्च में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के राज्यसभा सांसद और पश्चिम बंगाल के वर्तमान पार्टी प्रमुख समिक भट्टाचार्य ने मांग की थी कि उन्हें कोलकाता लौटने की अनुमति दी जाए.

संसद के उच्च सदन में दिया गया यह बयान बाद में एक तीव्र राजनीतिक बयान बन गया.

नवंबर 2007 में, कट्टरपंथी समूहों ने शहर में हिंसक बंद और दंगे भड़काए, और उनकी आत्मकथात्मक रचनाओं, जैसे ‘द्विखंडितो’ (दो भागों में विभाजित) के लिए उन्हें निष्कासित करने की मांग की.

भारी दबाव के आगे झुकते हुए तत्कालीन वाम मोर्चा सरकार ने कथित तौर पर घुटने टेक दिए और नसरीन को कोलकाता से बाहर जाना पड़ा.

उनकी रचनाओं पर प्रतिबंध जारी रहा, साथ ही तृणमूल सरकार के बाद भी राज्य में उनके प्रवेश पर रोक लगी रही.

जिस शहर को वे अपना गोद लिया हुआ घर मानती थीं, उससे उनका जबरन निष्कासन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के समर्थकों के लिए एक कलंक बन गया.

हालांकि कुछ वामपंथी नेताओं ने इस कथित यात्रा पर कटाक्ष किया, वहीं कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) के नेता सुजान चक्रवर्ती ने कहा कि यह केंद्र सरकार का निर्णय है और यह केवल गृह मंत्रालय की मंजूरी से ही हो सकता है.

उन्होंने कहा कि तत्कालीन राज्य वाम मोर्चा सरकार को दोष क्यों दिया जा रहा है? कोई विदेशी नागरिक कहां और कितने समय तक रहेगा. यह राज्य सरकार का नहीं बल्कि केंद्र सरकार का निर्णय है. पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा सरकार रही होगी, लेकिन केंद्र में नहीं.

इस बीच, तृणमूल कांग्रेस विधायक अखरुज्जमा ने को बताया कि उन्होंने मुस्लिम समुदाय और इस्लाम में शरिया के विरुद्ध बहुत कुछ कहा है. अगर कोई मुसलमानों के विरुद्ध बोलता है तो डबल इंजन सरकार उसका सम्मान करेगी.

नई राज्य सरकार नसरीन की यात्रा के लिए सुरक्षा व्यवस्था को सक्रिय रूप से बढ़ा रही है और इस आयोजन को एक वैचारिक उलटफेर के रूप में पेश कर रही है.

एमएस/