
इस्लामाबाद, 1 अगस्त . पिछले साल पाकिस्तानी आतंकियों द्वारा पहलगाम में हुए हमले में 26 निर्दोष नागरिकों की हत्या के बाद भारत सरकार द्वारा सिंधु जल संधि (आईडब्ल्यूटी) को निलंबित करने के फैसले को “रणनीतिक और तार्किक” बताया गया है. एक रिपोर्ट में कहा गया है कि अंतरराष्ट्रीय समझौतों को एक पक्ष के हितों के लिए नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
मीडिया इंडिया ग्रुप की रिपोर्ट के अनुसार, मौजूदा सिंधु जल संधि का ढांचा बिना शर्त भरोसे पर बना था और इसमें सारी जिम्मेदारियां सिर्फ भारत पर थीं, जबकि बदले में कोई लाभ नहीं मिल रहा था. ऐसे में यह व्यवस्था नाकाम साबित हुई है और इसे बदलने की जरूरत है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान शांतिपूर्ण संबंध, भारत के साथ रचनात्मक संवाद और संधि के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए जरूरी प्रतिबद्धता दिखाने में विफल रहा है. इस्लामाबाद लगातार शत्रुतापूर्ण बयानबाजी और गैर-कूटनीतिक उकसावे वाले बयान दे रहा है, जिसमें भारत के खिलाफ परमाणु हमले की धमकियां भी शामिल हैं. साथ ही सीमा पार आतंकवाद को समर्थन देकर वह सिंधु जल संधि की भावना को भी कमजोर कर रहा है.
रिपोर्ट में कहा गया, “भारत सिंधु जल संधि के निलंबन पर अपने रुख पर कायम है. 1960 में हस्ताक्षरित यह समझौता सिंधु बेसिन की पांच हिमालयी नदियों के जल बंटवारे से जुड़ा है. इससे पाकिस्तान बौखलाहट में है. लेकिन उसे यह समझना होगा कि उसे भारत के साथ एक अच्छे पड़ोसी जैसा व्यवहार करना चाहिए, जैसा भारत ने 1947 में विभाजन के बाद से उसके साथ किया है. चाहे परमाणु धमकी हो या अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण जाने की बात, इससे उसे कुछ हासिल नहीं होगा.”
रिपोर्ट के मुताबिक भारत ने लगातार स्पष्ट किया है कि वह सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ दृढ़ कदम उठाता रहेगा. नई दिल्ली ने कहा है कि पाकिस्तान के साथ सार्थक संवाद तभी संभव है जब आतंक और हिंसा मुक्त माहौल हो और पाकिस्तान यह सुनिश्चित करे कि उसकी जमीन का इस्तेमाल भारत के खिलाफ आतंक के लिए न हो.
भारत सरकार ने अपना आधिकारिक पक्ष साफ शब्दों में रखा है: “पानी और खून साथ नहीं बह सकते, और न ही आतंक और व्यापार साथ चल सकते हैं.”
रिपोर्ट में कहा गया कि पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ चार पारंपरिक युद्ध छेड़े और हर बार उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शर्मिंदगी और कूटनीतिक हार का सामना करना पड़ा. लेकिन हार के बाद आत्मचिंतन के बजाय पाकिस्तान की सैन्य-राजनीतिक स्थापना ने दुश्मनी और बढ़ा दी. उसने जवाबदेही के बजाय इनकार को और सुधार के बजाय वैचारिक कट्टरता को चुना.
रिपोर्ट में बताया गया, “इसलिए जब तक पाकिस्तान अपनी राष्ट्रीय चेतना में आमूलचूल बदलाव नहीं करता – जब तक सेना की वैचारिक एकाधिकार खत्म नहीं होता, लोकतांत्रिक जवाबदेही नहीं आती और पाकिस्तान खुद को भारत के खिलाफ एक गढ़ के बजाय एक व्यवहार्य राष्ट्र के रूप में नहीं देखता – तब तक सिंधु जल का नियमित प्रवाह और सामान्य सीमा पार व्यापार की उम्मीदें दूर का सपना बनी रहेंगी. इस कायापलट के बिना पाकिस्तान से कोई भी संवाद नाजुक, अस्थिर रहेगा और हर पहल नाकाम होने के लिए अभिशप्त है.”
–
डीएससी