
रांची, 3 अगस्त . झारखंड की माटी, जल-जंगल और जमीन के संघर्ष का पर्याय रहे ‘दिशोम गुरु’ शिबू सोरेन के देहावसान को पूरा एक वर्ष बीत चुका है. एक साल पहले जब 4 अगस्त को यह जननायक हमसे विदा हुआ तो सदियों पुरानी उस आदिवासी चेतना के एक कालखंड का अंत हो गया, जिसने शोषण के खिलाफ कभी झुकना नहीं सीखा.
हाल में भारत सरकार ने शिबू सोरेन को मरणोपरांत पद्म भूषण से सम्मानित कर उनके जनसंघर्ष, आदिवासी अस्मिता की रक्षा और झारखंड राज्य के निर्माण में निभाई गई ऐतिहासिक भूमिका को राष्ट्रीय सम्मान दिया. यह सम्मान उस विरासत की स्वीकृति भी है, जिसने झारखंड की राजनीति और सामाजिक चेतना को दशकों तक दिशा दी. शिबू सोरेन महज एक राजनीतिक शख्सियत नहीं थे. वे हाशिए पर धकेले गए गरीब-गुरबों की बुलंद आवाज, स्वाभिमान का प्रतीक और खुद में एक जीवित क्रांति थे.
उन्होंने व्यक्तिगत पीड़ा को समूचे समाज के अधिकार की लड़ाई में बदल दिया था. 11 अप्रैल 1944 को हजारीबाग (वर्तमान रामगढ़) के छोटे से गांव नेमरा में जन्मे शिबू सोरेन का बचपन दुखों से घिरा रहा. मात्र 12 वर्ष की अल्पायु में ही सूदखोर महाजनों ने उनके पिता की बेरहमी से हत्या कर दी थी. इस दर्दनाक हादसे ने बालक शिबू के मन में बदले की नहीं, बल्कि शोषण की पूरी व्यवस्था को उखाड़ फेंकने की जिद पैदा कर दी. किशोरावस्था से ही वे गांव-गांव घूमकर आदिवासियों और मूलवासियों को एकजुट करने लगे.
कानूनी, सामाजिक और जमीनी स्तर पर महाजनी प्रथा के खिलाफ उन्होंने जो बिगुल फूंका, उसने जंगल-झाड़ से भरे प्रदेश में एक ऐसा चेतना जागृत की, जिसे हमेशा याद रखा जाएगा. महाजनों के कब्जे से गरीब किसानों की फसल बचाने के लिए उन्होंने ऐतिहासिक ‘धान काटो आंदोलन’ का नेतृत्व किया. खेतों में काम करती महिलाएं और तीर-धनुष से उनकी सुरक्षा करते पुरुष, यह दृश्य महज फसल काटने का नहीं, बल्कि हक छीनने की हुंकार था. दमनकारी रवैये का सामना करते हुए वे जेल गए, जंगलों में रहकर संघर्ष का संचालन किया और निष्कासन तक झेला.
‘सोनोत संताल समाज’ के गठन से लेकर सामाजिक कुरीतियों को दूर करने तक, उनके कार्यों ने उन्हें जनता के दिल में ‘दिशोम गुरु’ यानी ‘देश के नेता’ का सम्मान दिलाया. 4 फरवरी 1972 को धनबाद की ऐतिहासिक धरती पर विनोद बिहारी महतो और कॉमरेड एके राय के साथ मिलकर शिबू सोरेन ने ‘झारखंड मुक्ति मोर्चा’ की नींव रखी. वे इसके संस्थापक महासचिव बने. इसके बाद तो छोटानागपुर से लेकर बंगाल और ओडिशा तक जनआंदोलन की ऐसी लहर उठी, जिसने दिल्ली के राजनीतिक गलियारों को हिला दिया.
पहली बार 1980 में दुमका से सांसद बनने वाले गुरुजी 1991 में झामुमो के केंद्रीय अध्यक्ष बने. संथाल परगना में उनका प्रभाव ऐसा था कि चुनावी दौर में केवल उनका नाम और तस्वीर ही जीत की गारंटी बन जाती थी. वर्ष 2000 में जब झारखंड एक पृथक राज्य के रूप में नक्शे पर आया, तो वह गुरुजी के दशकों लंबे जनआंदोलन का ही फल था. वे तीन बार राज्य के मुख्यमंत्री बने और केंद्र सरकार में दो बार कैबिनेट मंत्री का दायित्व निभाया. भले ही वे सत्ता के सर्वोच्च शिखरों पर पहुंचे, लेकिन उनका मूल स्वभाव कभी नहीं बदला.
उनका जीवन सादगी का अद्वितीय उदाहरण रहा. वे जहां भी रहे, उनके हाथ और पांव हमेशा अपनी माटी और खेती-किसानी से जुड़े रहे. राजनीति के लंबे सफर में उतार-चढ़ाव और विवाद भी आए, लेकिन जनता के प्रति उनका समर्पण और संघर्ष कभी कम नहीं हुआ. पहली पुण्यतिथि पर झारखंड का कण-कण अपने इस अमर जननायक को नमन कर रहा है.
–
एसएनसी/डीकेपी