एमएस स्वामीनाथन: 1960 का अकाल, खाली थालियां और एक शख्स, जिसने कैम्ब्रिज से लौटकर खेतों को चुना और बचा लिया देश

नई दिल्ली, 6 अगस्त . 1960 के दशक में भारत में भयंकर अकाल पड़ा था और लोग बड़े पैमाने पर भुखमरी का शिकार हो रहे थे. पश्चिम से मिलने वाली खाद्य सहायता ही हमारी जीवन रेखा थी. संकट के उस दौर में एक नाम सामने आया डॉ. एमएस स्वामीनाथन. उनकी दूरदर्शिता और अथक प्रयासों ने पूरे हिंदुस्तान की किस्मत बदल डाली. उन्होंने किसानों के जीवन में सुधार करने और कृषि की उन्नति में युगांतरकारी भूमिका निभाई, जहां से भारत में ‘हरित क्रांति’ का सिलसिला शुरू हुआ.

7 अगस्त 1925 को तमिलनाडु के छोटे से शहर कुंबकोणम में जन्मे मनकोम्बु सांबशिवन स्वामीनाथन को घर वाले प्यार से उन्हें एमएसएस बुलाते थे. शायद तब किसी ने नहीं सोचा था कि यही बच्चा एक दिन पूरे भारत की थाली का भाग्य लिखेगा. किशोरावस्था में ही स्वामीनाथन ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भारत में पड़े भयंकर अकाल को देखा. लाइन में लगे भूखे लोग, खाली थालियां, ये तस्वीर उनके मन में घर कर गई.

कृषि में डिग्री लेने के बाद उन्होंने आईपीएस की परीक्षा भी पास की. नौकरी पक्की थी, वर्दी और रुतबा को दरकिनार कर उन्होंने खेत चुना. वो जेनेटिक्स की पढ़ाई के लिए कैम्ब्रिज पहुंचे और वहां मशहूर वैज्ञानिक सर फ्रेडरिक गौलैंड हॉपकिंस के साथ काम किया.

बाद में उनकी मुलाकात नोबेल विजेता डॉ. नॉर्मन बोरलॉग से हुई. दोनों ने मिलकर भारत के खेतों में गेहूं और धान की नई, ज्यादा उपज देने वाली किस्में उतारीं. स्वामीनाथन लैब में नहीं बैठे. उन्होंने छोटे किसानों और बाद में तटीय मछुआरों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया, उनकी बातें सुनीं, उनसे सीखा और उनका भरोसा जीता.

1960 के दशक में आए भीषण अकाल में लोग भूख से मर रहे थे. पश्चिमी देशों से आने वाला अनाज ही हमारी सांसें चला रहा था. उसी अंधेरे में स्वामीनाथन की मेहनत ने रोशनी की. उनके विज्ञान-आधारित प्रयासों से भारत में ‘हरित क्रांति’ आई. यह विज्ञान पर आधारित एक ऐसा आंदोलन था जिसने भारत को अनाज के लिए दूसरों पर निर्भर रहने वाले देश से अनाज का भंडार बनाने वाले देश में बदल दिया.

1980 तक आते-आते प्रोफेसर स्वामीनाथन एक जाना-माना नाम बन चुके थे. उन्होंने दुनियाभर के आयोगों की अध्यक्षता की, जैव विविधता की नीतियां बनाईं और जीवनकाल में 80 से ज्यादा मानद डॉक्टरेट की उपाधियां पाईं. उन्हें वर्ल्ड फूड प्राइज, रेमन मैग्सेसे अवार्ड और पद्म विभूषण जैसे कई सम्मान मिले. सम्मान चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, वे हमेशा एक संवेदनशील और विनम्र शिक्षक, मार्गदर्शक, सहयोगी, दोस्त और जनसेवक बने रहे.

एमएस स्वामीनाथन ने खेती के लिए एक समग्र दृष्टिकोण की वकालत की, जिसमें स्थिरता, लैंगिक समानता और संरक्षण पर जोर दिया गया. यहीं से उनके ‘एवरग्रीन रिवोल्यूशन’ के विचार की शुरुआत हुई.

जीवन के आखिरी पड़ाव में उन्होंने एक नया शब्द ‘बायोहैप्पीनेस’ दिया. यह शब्द एक ऐसे साझा भविष्य को अच्छी तरह से परिभाषित करता है जो आज जलवायु परिवर्तन, जैव-विविधता के नुकसान और बढ़ती असमानता जैसे कई संकटों से जूझ रहा है. बायो-हैप्पीनेस का मतलब है प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर जीने और अपने जैविक या प्राकृतिक संसाधनों का समान रूप से इस्तेमाल सुनिश्चित करने से मिलने वाली खुशी.

28 सितंबर 2023 को हरित क्रांति में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले डॉ. एमएस स्वामीनाथन का निधन हो गया. साल 2024 में मरणोपरांत उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया. यह सम्मान उन्हें कृषि और किसानों के कल्याण में उनके अभूतपूर्व योगदान के लिए दिया गया.

डीसीएच/वीसी