
नई दिल्ली, 14 सितंबर . हिंदी, सांस्कृतिक और जमीन से जुड़ी हुई ऐसी भाषा है, जिसने कई स्थानीय भाषाओं को खुद में समेटा है. हिंदी साहित्य ने ब्रज, अवधी, मैथिली, राजस्थानी और भोजपुरी जैसी समृद्ध लोक बोलियों की विरासत को अपने साथ जोड़ा, जिससे इसकी जड़ें गांवों और आम जन तक पहुंचीं. हिंदी दिवस के अवसर पर ने लेखक और कवि नीलोत्पल मृणाल से खास बातचीत की.
से बातचीत करते हुए क्लासिक और आधुनिक हिंदी के बारे में लेखक और कवि नीलोत्पल मृणाल ने कहा, “जो भी आज लिखा जा रहा है, 40-50 वर्ष बाद यही क्लासिक हो जाएगा. जब 30 वर्ष पहले क्लासिक लिखा गया था, तब वह एक नई रचना थी. जो किताब 30-50 वर्ष लगातार पाठकों के बीच लोकप्रिय बनी रहेगी, आगे जाकर यही क्लासिक हो जाएगी. किसी भी नई किताब के साथ क्लासिक की घोषणा अपने समय पर नहीं की जाती.”
नीलोत्पल मृणाल ने कहा, “जैसे मेरी किताब ‘डॉर्क हॉर्स’ है, वो 12 वर्ष पहले आई थी, लेकिन आज उसके बिकने की गति कई गुना बढ़ गई है, लेकिन 12 वर्ष और लगाने पर 30 वर्ष बाद कोई दूसरा बोलेगा कि ये किताब क्लासिक थी या नहीं थी. हिंदी भाषा को लेकर उर्दू और अंग्रेजी के शब्दों की जो चिंता व्यक्त की जाती है, इसके प्रति मेरी सहानुभूति है, लेकिन सच बात यह है कि इससे भाषा समृद्ध हो रही है. कभी भी उर्दू से अलग कोई हिंदी बोली नहीं गई है, या न ही वैसे उपन्यास लिखे गए हैं. भाषाई शुद्धता के नाम पर जिस हिंदी की बात की जाती है, उसमें भी उर्दू, फारसी और देसी बोलियों का समावेश है.”
नीलोत्पल ने आगे कहा, “हिंदी भाषा में अंग्रेजी का समावेश होना आज के समय की आवश्यकता है. हर किसी के जीवन में अंग्रेजी घुल मिल गया है. हिंदी का अपना व्याकरण और शिल्प है, उसके साथ छेड़खानी नहीं होनी चाहिए. हम लोग जब उपन्यास लिखते हैं तो इसका ख्याल रखते हैं. शब्दावलियों के अनुवाद में फंसने से बेहतर है कि दुनिया के साथ कदम मिलाते हुए नए आविष्कार करें. हम नया आविष्कार करके जो भी नामकरण करेंगे, दुनिया उसी नाम से बुलाएगी.”
उन्होंने कहा कि कोई भी भाषा अपनी पहचान की पुष्टि इस बात से करती है कि उस भाषा में एक गरिमापूर्ण आजीविका, एक निष्ठापूर्ण जीवन और एक गौरवपूर्ण भावना है या नहीं. हिंदी भाषा को इन तीन कसौटियों पर कसना चाहिए. हिंदी भाषा को पिछड़ा मानना मानसिकता की बात है. यह एक तरह से सांस्कृतिक मानसिकता है, जो लोग उच्च बोध से ग्रसित हैं और जिनको लगता है कि अंग्रेजी के रथ पर जो सवार है, वही महाभारत का विजेता है. इस भावना से हम जैसे लोग प्रतिदिन दो-दो हाथ कर रहे हैं और उसके सामने खड़े होकर कह रहे हैं कि हिंदी आजीविका दे रही है, प्रतिष्ठा दे रही है और गर्व भी दे रही है. हम लोग इसी तरह का माहौल बनाने की कोशिश कर रहे हैं.
नीलोत्पल ने कहा कि किसी भी साहित्य में बदलाव उसके व्याकरण या उसके लेखकों के मनमुताबिक नहीं आता. समाज के बदलाव के साथ किसी भी साहित्य में आता है. भारत का समाज जिस संक्रमण से गुजर रहा है, इसमें अच्छी और बुरी दोनों चीजें भी आ रही हैं. बुरी चीजों में परिवार टूट रहे हैं, मानव के तौर पर हम अकेले होते जा रहे हैं, भीड़ बढ़ती जा रही है, उसमें भी अकेले होते जा रहे हैं. विद्यार्थियों के लिए नौकरी का संघर्ष बढ़ रहा है, युवाओं के लिए रोजगार का संघर्ष बढ़ रहा है. ये सभी चीजें आज के साहित्य में आएंगी. अच्छी चीजें में गांवों में विकास के नाम पर इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित किया जा रहा है. उपन्यास लिखते समय इस पर भी प्रकाश डाला जाता है. जैसे-जैसे समाज बदलेगा, अपनी समय की राजनीति बदलेगी और हमारे सांस्कृतिक मूल्य बदलेंगे, तो उसका आईना उस समय के साहित्य में बदलेगा और वर्तमान साहित्य में दिख रहा है.
उन्होंने कहा, “जिस तरह से ओटीटी और फिल्मों में प्रयोग होने वाले अपशब्द हैं, साहित्य की ‘गाली’ से उसकी तुलना नहीं की जानी चाहिए. गाली हमारे समाजशास्त्रीय परिधि का हिस्सा है, इसको बाहर नहीं रखा जा सकता, लेकिन गाली अगर समाज के भाषा का हिस्सा है तो वो साहित्य में निकलकर आएगी. लेकिन देखना है कि कौन सी गाली बाजार के उत्पाद के तौर पर इस्तेमाल की गई है और कौन सी गाली समाज का अक्स दिखाने में स्वाभाविक तौर पर आती है. गाली लिखना साहित्य में नियम नहीं होना चाहिए, लेकिन जो सहज है वो आएगा और उससे परहेज भी नहीं करना है. उस पर कंबल डालकर छिपाना नहीं है. हर युग में भाषा नई होती है, क्योंकि नए युग की नई शब्दावलियां आती हैं और नए मुहावरे आते हैं. ऐसा नहीं है कि अंग्रेजी के कारण होता है. किसी भी दौर में भाषा नई होती जाती है. अगर भाषाएं नई नहीं होंगी तो मर जाएंगी.”
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एसडी/एबीएम