बंगाल की नई राजनीतिक पार्टी संसद के मानसून सत्र में कर सकती है एंट्री, फ्लोर लीडर का हुआ चुनाव

नई दिल्ली, 15 जुलाई . नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) ने बुधवार को सोशल मीडिया पर कई पोस्ट कर अपनी संसदीय पार्टी के नेताओं को बधाई दी. पार्टी ने हाल ही में हुए बड़े राजनीतिक घटनाक्रम के बाद खुद को लोकसभा में एक प्रमुख ताकत के रूप में स्थापित करने का दावा किया है.

इससे पहले पार्टी ने सुदीप बंद्योपाध्याय को लोकसभा में अपना फ्लोर लीडर, शताब्दी रॉय को उपनेता और काकोली घोष दस्तीदार को मुख्य सचेतक (चीफ व्हिप) नियुक्त किया था.

दल बदल के बाद सुदीप बंद्योपाध्याय ने कहा था कि अब वे संसद में ‘असली तृणमूल’ का प्रतिनिधित्व करेंगे. उन्होंने कहा कि इसकी शुरुआत 20 जुलाई से शुरू होने वाले मानसून सत्र से होगी.

बता दें कि अब तक ज्यादा चर्चा में नहीं रहने वाली एनसीपीआई ने एक भी लोकसभा चुनाव नहीं लड़ा है, लेकिन पिछले महीने वह अचानक राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आ गई. इसकी वजह यह रही कि तृणमूल कांग्रेस के 20 बागी सांसदों ने एनसीपीआई में विलय की घोषणा कर दी.

कोलकाता स्थित मुख्यालय वाली इस पार्टी ने 2023 में त्रिपुरा विधानसभा चुनाव भी लड़ा था, जहां उसे कुल 822 वोट मिले थे.

लोकसभा में तृणमूल के बागी सांसदों के शामिल होने के बाद एनसीपीआई अब सदन की पांचवीं सबसे बड़ी पार्टी और सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बाद दूसरी सबसे बड़ी सहयोगी पार्टी बनने का दावा कर रही है.

एनडीए के अन्य प्रमुख सहयोगियों में आंध्र प्रदेश की तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) के 16 और बिहार की जनता दल (यूनाइटेड) के 12 सांसद हैं. एनसीपीआई में शामिल सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर अपनी नई संसदीय पार्टी को मान्यता देने की मांग की है. साथ ही उन्होंने एनडीए को समर्थन देने की भी घोषणा की है, जो तृणमूल कांग्रेस के पहले के रुख से अलग है.

हालांकि, विशेषज्ञों के बीच इस बात पर मतभेद है कि क्या यह कदम दल-बदल विरोधी कानून के तहत इन सांसदों को अयोग्यता से बचा सकता है. कुछ राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे ‘शेल पार्टी’ की रणनीति बताया है, जिसमें एक छोटी और लगभग अज्ञात पार्टी का इस्तेमाल राजनीतिक और कानूनी सुरक्षा पाने के लिए किया जाता है.

वहीं, बागी सांसदों का कहना है कि उन्हें संविधान की दसवीं अनुसूची के पैरा-4 के तहत सुरक्षा मिलती है. इस प्रावधान के अनुसार, यदि किसी पार्टी के दो-तिहाई विधायक या सांसद विलय के पक्ष में हों तो उन्हें दल-बदल के आधार पर अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता.

कानूनी विशेषज्ञों की राय भी इस मुद्दे पर अलग-अलग है. कुछ का मानना है कि संबंधित प्रावधान में ‘पार्टी’ शब्द का मतलब केवल सांसदों का समूह नहीं, बल्कि पूरी राजनीतिक पार्टी से है, भले ही दो-तिहाई सांसद विलय के पक्ष में क्यों न हों.

इस पूरे घटनाक्रम ने यह बहस भी छेड़ दी है कि भले ही यह कदम कानूनी रूप से दल-बदल कानून से बच निकलने का रास्ता देता हो, लेकिन इससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया और मतदाताओं के प्रतिनिधित्व को लेकर कई सवाल खड़े होते हैं.

पिछले महीने तृणमूल कांग्रेस के महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी ने पार्टी के प्रतिनिधिमंडल के साथ लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात की थी. उन्होंने बागी सांसदों के एनसीपीआई में विलय को अवैध बताते हुए उन्हें संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्य घोषित करने की मांग की थी.

हालांकि, अभी तकलोकसभा अध्यक्ष ने इस नए समूह को आधिकारिक मान्यता नहीं दी थी. लोकसभा की आधिकारिक वेबसाइट पर अब भी तृणमूल कांग्रेस के 28 सांसद दर्ज हैं. एनसीपीआई में शामिल सांसदों को भरोसा है कि जांच के बाद उन्हें मान्यता मिल जाएगी. उन्होंने रविवार को अपनी नई संसदीय पार्टी की बैठक भी बुलाई है.

एएमटी/डीकेपी