ब्रिक्स का विस्तार: भारत-चीन दृष्टिकोण से बदलता वैश्विक दक्षिण

बीजिंग, 14 सितंबर . चीन में एक भारतीय पत्रकार के रूप में भारत-चीन संबंधों और बदलती विश्व व्यवस्था को देखते हुए ब्रिक्स का विस्तार एक दिलचस्प सवाल खड़ा करता है- क्या यह मंच केवल उभरती अर्थव्यवस्थाओं का समूह है या भारत और चीन जैसे देशों के लिए वैश्विक दक्षिण की भूमिका को नए सिरे से परिभाषित करने का अवसर भी है?

‘ब्रिक’ के रूप में शुरू हुआ यह मंच आज सदस्य और साझेदार देशों के व्यापक समूह में बदल चुका है. इसका विस्तार ऐसे समय में हो रहा है जब वैश्विक शक्ति-संतुलन तेजी से बदल रहा है और विकासशील देश वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में अधिक प्रतिनिधित्व की मांग कर रहे हैं.

भारत और चीन दोनों ब्रिक्स को वैश्विक दक्षिण के लिए महत्वपूर्ण मंच मानते हैं, हालांकि उनकी प्राथमिकताओं में अंतर भी दिखाई देता है. चीन ब्रिक्स के विस्तार को बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था और वैश्विक शासन में सुधार को आगे बढ़ाने के अवसर के रूप में देखता है. भारत भी बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार, विकासशील देशों की आवाज को मजबूत करने और वैश्विक दक्षिण के हितों को सामने लाने पर जोर देता है.

यहीं ब्रिक्स भारत-चीन सहयोग के लिए एक महत्वपूर्ण साझा मंच बन सकता है. दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों में मतभेद और चुनौतियां मौजूद हैं, लेकिन जलवायु परिवर्तन, विकास, खाद्य एवं ऊर्जा सुरक्षा, वैश्विक व्यापार और विकासशील देशों के प्रतिनिधित्व जैसे कई मुद्दों पर साझा हित भी हैं.

तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता ब्रिक्स सहयोग का एक नया क्षेत्र बन रहे हैं. चीन डिजिटल अर्थव्यवस्था, एआई और औद्योगिक नवाचार में अपनी क्षमताओं को साझा करने पर जोर दे रहा है, जबकि भारत डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे, तकनीकी प्रतिभा और नवाचार के अनुभव को वैश्विक दक्षिण के साथ साझा करने की क्षमता रखता है. इन दोनों दृष्टिकोणों के बीच सहयोग ब्रिक्स के लिए नए अवसर पैदा कर सकता है.

हालांकि, ब्रिक्स की बढ़ती विविधता चुनौती भी है. सदस्य देशों के राजनीतिक और आर्थिक हित अलग-अलग हैं. भारत और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा भी कई क्षेत्रों में दिखाई देती है. इसलिए ब्रिक्स की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सदस्य देश मतभेदों को प्रबंधित करते हुए साझा हितों पर कितना व्यावहारिक सहयोग कर पाते हैं.

भारत-चीन संबंधों के संदर्भ में ब्रिक्स का महत्व इसी संतुलन में है. यह ऐसा मंच है जहां प्रतिस्पर्धा के बावजूद संवाद की गुंजाइश बनी रहती है और साझा वैश्विक मुद्दों पर सहयोग का रास्ता खुला रहता है.

ब्रिक्स का विस्तार केवल एक संगठन के विस्तार की कहानी नहीं है. यह वैश्विक दक्षिण की बढ़ती आकांक्षाओं और भारत-चीन जैसी प्रमुख उभरती शक्तियों की बदलती भूमिका का भी संकेत है. आने वाले वर्षों में ब्रिक्स की वास्तविक ताकत इस बात से तय होगी कि भारत और चीन समेत उसके सदस्य देश अपनी विविधताओं के बीच साझा हितों को कितनी प्रभावी ढंग से वैश्विक सहयोग में बदल पाते हैं.

(साभार- चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)

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