
नई दिल्ली, 17 अगस्त . पश्चिम एशिया में होर्मुज स्ट्रेट का संकट वैश्विक व्यापार के लिए जिस खतरे को सामने लाया है, चीन ने जवाब में एक नए समुद्री रास्ते की ओर कदम बढ़ा दिए हैं. बीजिंग ने रूस के उत्तरी तट से गुजरने वाले नॉर्दर्न सी रूट (एनएसआर) पर नियमित कंटेनर सेवा शुरू कर दी है. आर्कटिक की बर्फ के बीच खुल रहा यह रास्ता चीन-यूरोप व्यापार के लिए नया विकल्प बन सकता है. लेकिन भारत के लिए इसकी कहानी सिर्फ व्यापार की नहीं, बल्कि बदलते समुद्री शक्ति संतुलन की भी है.
ब्रिटिश और अमेरिकी मीडिया के मुताबिक, चीन की शिपिंग कंपनी सी लिजेंड ने निंगबो-झोउशान से ब्रिटेन के फेलिक्स्टोवे तक एनएसआर के रास्ते करीब 18 दिन की यात्रा सेवा शुरू की है. इसकी तुलना में स्वेज नहर से यही यात्रा 40 दिन से ज्यादा ले सकती है. लगभग 5,500 किलोमीटर लंबा यह मार्ग गर्मियों में समुद्री बर्फ कम होने के कारण पहले की तुलना में ज्यादा समय तक नौवहन के लिए खुला रह रहा है.
यहीं से भारत के लिए इस घटनाक्रम का महत्व शुरू होता है. चीन वर्षों से आर्कटिक को अपनी ‘पोलर सिल्क रोड’ का हिस्सा बनाने की कोशिश कर रहा है. 2017 में राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने चीन और रूस के बीच आर्कटिक शिपिंग मार्ग विकसित करने की बात कही थी. अब पहली नियमित व्यावसायिक सेवा शुरू करके बीजिंग उस रणनीति को जमीन पर उतारने की दिशा में आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है.
भारत के लिए चिंता की पहली वजह यह है कि चीन अपने यूरोपीय व्यापार के लिए उन समुद्री मार्गों पर निर्भरता घटाने की कोशिश कर रहा है जो भू-राजनीतिक संकट की चपेट में आ सकते हैं. होर्मुज और स्वेज जैसे मार्गों में तनाव, युद्ध या किसी भी तरह की नाकेबंदी पूरी आपूर्ति शृंखला को प्रभावित कर सकती है. आर्कटिक का रास्ता अभी इसका विकल्प नहीं बना है, लेकिन चीन ने यह दिखा दिया है कि वह भविष्य के लिए वैकल्पिक रास्तों पर निवेश करने को तैयार है.
भारत भी इस बदलाव से अनजान नहीं है. नई दिल्ली की आर्कटिक नीति (17 मार्च 2022 को पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने लॉन्च किया था) अब केवल जलवायु और वैज्ञानिक अनुसंधान तक सीमित नहीं रही. ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री मार्ग, खनिज संसाधन और रूस के साथ कनेक्टिविटी इसके महत्वपूर्ण हिस्से बन चुके हैं. भारत 2008 से आर्कटिक में वैज्ञानिक उपस्थिति रखता है और अब नॉर्दर्न सी रूट को आर्थिक तथा रणनीतिक दृष्टि से भी देख रहा है.
दिलचस्प बात यह है कि भारत के पास आर्कटिक तक पहुंच बनाने का अपना रास्ता भी है. चेन्नई-व्लादिवोस्तोक ईस्टर्न मैरीटाइम कॉरिडोर को भविष्य में नॉर्दर्न सी रूट से जोड़ने की संभावना पर काम हो रहा है. 2025 में भारत-रूस व्यापार मंच का आयोजन नई दिल्ली में हुआ था. इस दौरान रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच एनएसआर पर सहयोग बढ़ाने को लेकर सहमति भी बनी थी. भारत और रूस ने एनएसआर पर सहयोग बढ़ाने के लिए कार्यसमूह भी बनाया है. दोनों देशों के बीच ध्रुवीय जल में चलने वाले जहाजों के विशेषज्ञों के प्रशिक्षण और आइसब्रेकर निर्माण जैसे क्षेत्रों में सहयोग पर भी चर्चा हुई है.
इसका अर्थ यह है कि भारत चीन की ‘आइस सिल्क रोड’ का केवल दर्शक नहीं है. भारत के लिए एनएसआर रूस के आर्कटिक क्षेत्रों को भारतीय बंदरगाहों से जोड़ने वाला अतिरिक्त रास्ता बन सकता है. पूर्वी समुद्री गलियारे के जरिए भारतीय बंदरगाहों को व्लादिवोस्तोक से जोड़कर वहां से आर्कटिक मार्ग तक पहुंच बनाने की परिकल्पना की जा रही है.
इसका एक बड़ा रणनीतिक लाभ ऊर्जा के क्षेत्र में हो सकता है. रूस के आर्कटिक क्षेत्र में तेल, गैस और महत्वपूर्ण खनिजों के बड़े भंडार हैं. भारत पहले से रूस से बड़ी मात्रा में ऊर्जा आयात करता है. ऐसे में आर्कटिक संसाधनों तक पहुंच के लिए रूस के साथ सहयोग भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत कर सकता है.
लेकिन चीन के मुकाबले भारत के लिए एनएसआर का आर्थिक लाभ उतना सीधा नहीं है. चीन की भौगोलिक स्थिति उसे आर्कटिक मार्ग का ज्यादा स्वाभाविक उपयोगकर्ता बनाती है. भारत से यूरोप जाने वाले जहाजों के लिए एनएसआर हमेशा पारंपरिक समुद्री मार्ग से बेहतर विकल्प नहीं होगा. ऊंची परिचालन लागत, बर्फ में चलने वाले विशेष जहाजों की कमी, बीमा की कठिनाइयां और सीमित नौवहन मौसम इसके सामने बड़ी बाधाएं हैं.
आर्कटिक की पर्यावरणीय चुनौती भी कम गंभीर नहीं है. रिपोर्ट के अनुसार तेल रिसाव की स्थिति में वहां राहत और सफाई अभियान बेहद मुश्किल हो सकते हैं. अत्यधिक ठंड, दूरदराज के इलाके और सीमित लॉजिस्टिक ढांचा किसी दुर्घटना को लंबे समय तक चलने वाली पर्यावरणीय त्रासदी में बदल सकता है. ब्लैक कार्बन जैसे प्रदूषक आर्कटिक की बर्फ पर जमकर सूर्य की गर्मी के अवशोषण को बढ़ा सकते हैं, जिससे ग्लोबल वार्मिंग और तेज हो सकती है.
इसके अलावा एनएसआर का बड़ा हिस्सा रूस के नियंत्रण में है. रूस की सरकारी परमाणु ऊर्जा कंपनी रोसाटॉम मार्ग पर नौवहन परमिट और आइसब्रेकर सहायता की महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. यूक्रेन युद्ध के बाद रूस पर पश्चिमी प्रतिबंधों ने इस मार्ग को और अधिक राजनीतिक बना दिया है. किसी दुर्घटना या आपात स्थिति में अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के लिए बचाव और बीमा से जुड़े सवाल भी चुनौती बन सकते हैं.
चीन ने इस दिशा में पहला नियमित व्यावसायिक कदम उठा दिया है. भारत के लिए चुनौती अब चीन से आगे निकलने की नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने की है कि बदलते समुद्री नक्शे में वह पीछे न छूटे.
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केआर/