हिरासत में प्रताड़ना मामला: पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग ने उठाई कानूनी ढांचे में सुधार की मांग

इस्लामाबाद, 21 जुलाई . पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग (एचआरसीपी) ने मंगलवार को सरकार से देश में यातना और हिरासत में प्रताड़ना के खिलाफ कानूनी ढांचे को मजबूत करने की मांग की है. आयोग ने चेतावनी दी कि पाकिस्तान की आपराधिक न्याय व्यवस्था में ये दुरुपयोग अब भी “व्यापक और सामान्य” बने हुए हैं और पुलिस लॉकअप, जेलों और पूछताछ केंद्रों में नियमित रूप से किए जाते हैं.

एचआरसीपी ने पाकिस्तानी नागरिकों की ओर से सरकार से आग्रह किया कि वह टॉर्चर एंड कस्टोडियल डेथ (प्रिवेंशन एंड पनिशमेंट) एक्ट, 2022 में संशोधन करे और मानसिक यातना को एक अलग अपराध के रूप में मान्यता दे.

मानवाधिकार संगठन ने जांच व्यवस्था में सुधार की भी मांग की ताकि जांच एजेंसियां अन्य संस्थानों, विशेष रूप से उन कानून प्रवर्तन एजेंसियों से स्वतंत्र रह सकें, जिन पर खुद ऐसे अत्याचारों में शामिल होने के आरोप लगते हैं.

एचआरसीपी ने कहा, “पीड़ितों के अनुभव और यहां तक कि आधिकारिक आंकड़े भी बताते हैं कि पाकिस्तान की आपराधिक न्याय प्रणाली में यातना एक व्यापक समस्या है, जो लॉकअप, जेलों और पूछताछ कक्षों में रोजाना होती है.”

संगठन ने कहा, ” जो लोग इस तरह की प्रताड़ना से बच जाते हैं, उनके शारीरिक जख्म तो समय के साथ ठीक हो सकते हैं, लेकिन मानसिक चोटें अक्सर लंबे समय तक बनी रहती हैं. पीड़ितों को पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस या मानहानि का सामना करना पड़ता है, जबकि लापता या मृत लोगों के परिवार न्याय के बिना दुख झेलते रहते हैं.”

एचआरसीपी ने कहा कि पाकिस्तान ने वर्ष 2010 में संयुक्त राष्ट्र के यातना विरोधी कन्वेंशन को स्वीकार किया था और अपनी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए वर्ष 2022 में टॉर्चर एंड कस्टोडियल डेथ कानून बनाया, लेकिन यह कानून अभी भी कमजोर है और इसका प्रभावी तरीके से पालन नहीं हो रहा है. इसके कारण दोषियों को अक्सर जवाबदेह नहीं ठहराया जाता.

संगठन ने कहा,”यातना पूरी तरह से अवैध है, लेकिन जब इसे बिना रोक-टोक जारी रहने दिया जाता है तो यह संस्थागत रूप ले लेती है.” एचआरसीपी के अनुसार, जब पूछताछ करने वालों को यातना के तरीकों की आदत पड़ जाती है और संस्थान इसे नजरअंदाज करते हैं, तो यह राज्य व्यवस्था में जवाबदेही की कमी को दर्शाता है.

मानवाधिकार आयोग ने यह भी कहा कि यातना का असर केवल पीड़ितों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह उन संस्थानों की विश्वसनीयता को भी कमजोर करता है जिनका काम नागरिकों के जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा करना है.

एचआरसीपी ने आरोप लगाया, “कई मामलों में अदालतें यातना के जरिए हासिल किए गए सबूतों को स्वीकार कर लेती हैं, जिससे न्याय व्यवस्था के भीतर ही ऐसे दुरुपयोग को बढ़ावा मिलता है.”

पिछले महीने भी एचआरसीपी ने प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को पत्र लिखकर देश की हिरासत सुविधाओं में कथित रूप से जारी शारीरिक और मानसिक यातना तथा अमानवीय व्यवहार पर गंभीर चिंता जताई थी.

अंतरराष्ट्रीय यातना पीड़ित समर्थन दिवस के अवसर पर भेजे गए इस पत्र में संगठन ने कहा था कि पाकिस्तान का मौजूदा कानूनी ढांचा ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए पर्याप्त नहीं है.

एचआरसीपी ने यह भी चेतावनी दी कि हिरासत केंद्रों में निगरानी और रिपोर्टिंग की व्यवस्थित व्यवस्था के अभाव के कारण यातना और दुर्व्यवहार की वास्तविक स्थिति नीति निर्माताओं, नागरिक समाज और अंतरराष्ट्रीय निगरानी संस्थाओं तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाती.

केआर/