
नई दिल्ली, 14 सितंबर . भाषा ही एक ऐसी कड़ी है, जो हमें अपनी मिट्टी, अपने इतिहास और अपनी संस्कृति से जोड़ती है. हर भाषा एक इतिहास, लोक परंपरा और जीवन-दृष्टि को लेकर चलती है, जो नई पीढ़ी के संस्कार को भी आगे बढ़ाती है. यही भाषाई बहुलता भारत की ‘विविधता में एकता’ की भावना को सशक्त बनाती है.
जब वर्तमान दौर और नई पीढ़ी अपने नए शब्दों की परिभाषा गढ़ रही हो, तब भाषा सिर्फ बोलने का माध्यम नहीं रहती, वह अपने समय का आईना बन जाती है. हिंदी भी इस बदलाव से अछूती नहीं है. हिंदी भाषा आज इंटरनेट, मीम्स, रील्स और हिंग्लिश के दौर में एक नए रूप से गुजर रही है.
लेखक नवीन चौधरी मानते हैं कि रोजमर्रा की भाषा रोजमर्रा के जीवन से बनती है. हम उस दौर में हैं, जहां घर में हिंदी में सोचते हैं, लेकिन दफ्तर और स्कूल में अंग्रेजी में जीते हैं. ऐसे में अकादमिक हिंदी का बोला जाना आसान नहीं है और ऐसा नहीं कि यह अभी हो रहा है, पहले भी बोलचाल की हिंदी अकादमिक हिंदी नहीं थी.
से बातचीत में नवीन चौधरी कहते हैं, “मैं बदलते परिवेश में हिंग्लिश को भाषा विकृति की जगह एक नई भाषिक व्यवस्था के रूप में देखता हूं, जो भारत के शहरी, द्विभाषी मध्यवर्ग की असली आवाज है. हम यह नहीं कहते कि ‘मित्र, क्या हम चलचित्र देखने चलें?’ हमारी भाषा में ‘भाई फिल्म देखने चलेगा क्या?’ आता है और यह वाक्य बिल्कुल अटपटा नहीं लगता क्योंकि यही रोजमर्रा की, बोलचाल और बाजार की भाषा बन चुकी है.”
नवीन चौधरी कहते हैं, “मैं यह भी मानता हूं कि हिंग्लिश हिंदी की जगह नहीं ले रही, बल्कि हिंदी के भीतर एक नई बोली बनकर उभर रही है, जैसे पहले खड़ी बोली, ब्रज या अवधी हिंदी के भीतर अलग-अलग रजिस्टर थे. फर्क सिर्फ इतना है कि बोली का यह स्वरूप भूगोल से नहीं, बल्कि वर्ग, माध्यम और पीढ़ी से तय हो रहा है. इसलिए इस बदलाव को हिंदी के लगातार बदलते, ग्रहणशील स्वभाव के ताजा उदाहरण के रूप में देखना चाहिए. यह ठीक वैसा ही है, जैसे सदियों पहले फारसी-अरबी शब्दों को हिंदी ने अपनाया था.”
इसे लेखक अमित गुप्ता इस नजर से देखते हैं कि यह किसी नई हिंदी का जन्म नहीं है. भाषाओं का विकास हमेशा से दूसरी भाषाओं के शब्दों को अपनाने से ही होता है, क्योंकि जो भाषा बदलाव के लिए तैयार नहीं होती, वह आगे नहीं बढ़ पाती. रही बात ‘नई हिंदी’ जैसे शब्दों की, तो यह सिर्फ एक मार्केटिंग पैंतरा है और इससे ज्यादा कुछ नहीं. यह सामान्य बोलचाल को एक नया नाम देकर बेचने का जरिया है.
लेखक वसीम अकरम मानते हैं कि भाषा हमेशा समय के साथ चलती है. जहां तक बात हिंदी के जन्म के नए दौर की है तो ऐसा हर दौर में कहा जाता रहा है. जब भी हिंदी रचनाशीलता में कुछ नया प्रयोग होता है और वह लोगों को आकर्षित करता है तो उसे हिंदी का नया दौर कहा जाने लगता है. हालांकि मैं इसे हिंदी का नया जन्म जैसी संज्ञा नहीं दे सकता.
वसीम अकरम कहते हैं कि हिंग्लिश भी हिंदी के बदलते स्वरूप का एक स्वाभाविक पड़ाव है. यह गलत नहीं है या यूं कह लें कि हिंदी के लिए एक नया दौर है. इसलिए हमें नई पीढ़ी की भाषा को खारिज करने के बजाय उसमें हिंदी की मिठास और अपनी जड़ों से जुड़ाव बनाए रखना चाहिए. नई हिंदी वही होगी जो आधुनिक भी हो, सहज भी हो और अपनी पहचान पर गर्व भी करे.
‘जेन-जी’ और ‘जेन-अल्फा’ जैसे शब्दों के जन्म और इस प्रवृत्ति में हिंदी के पिछड़ेपन पर भी लेखकों की अपनी राय है.
अमित गुप्ता कहते हैं कि भाषा का इस्तेमाल लोग दूसरों से जुड़ने और संवाद करने के लिए करते हैं. आज के कंटेंट क्रिएटर्स और यूट्यूबर्स वही भाषा बोलते हैं, जिससे उन्हें ज्यादा से ज्यादा व्यूज, हिट्स और रीच मिले. यह पूरी तरह से एक बिजनेस मॉडल है. जब तक अंग्रेजी के तकनीकी या ट्रेंडिंग शब्द ज्यादा व्यूज दिला रहे हैं, लोग उन्हीं का इस्तेमाल करेंगे.
जबकि वसीम अकरम सोचते हैं कि हिंदी में शब्दों की कोई कमी नहीं है. कमी उन्हें नए संदर्भों, नए माध्यमों और नई पीढ़ी की बातचीत में सहजता से पहुंचाने की है. अक्सर लोग इस बात को खारिज कर देते हैं कि हिंदी में नयापन नहीं है. दरअसल, शब्दों के प्रयोग के नए तरीकों से नई तरह की भाषा का जन्म होता है. अंग्रेजी के शब्द बोलचाल में आसानी से जुबान पर उतर जाते हैं, इसलिए ‘जेनजी’ जैसे शब्दों का प्रयोग बढ़ जाता है. इसमें गलत नहीं है. इसी तरह अगर हम अपने हिंदी शब्दों को रोचक तरीके से सोशल मीडिया, सिनेमा, संगीत और तकनीक से जोड़ें, तो वे भी ट्रेंड बना सकते हैं. भाषा की ताकत उसके शब्दकोश में नहीं, बल्कि इस बात में है कि उसके शब्द लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी में कितने जीवंत हैं.
वहीं, नवीन चौधरी का मानना है कि आज के दौर में हम सबका जीवन इंटरनेट से प्रभावित है. हमारे काम से लेकर भाषा तक, जीवनशैली से लेकर ट्रेंड्स तक पर डिजिटल माध्यमों का प्रभाव है. और इस माध्यम की डिफॉल्ट भाषा अंग्रेजी है. अब बाजार देखते हुए उसमें कुछ बदलाव हो रहे हैं, लेकिन ग्लोबल स्तर पर यह अंग्रेजी ही है. मीम्स, कैप्शन, ग्लोबल कल्चर उसी में गढ़े जाते हैं. हिंदी शब्द ट्रेंड में इसलिए पीछे रहते हैं, क्योंकि उन्हें गढ़ने और फैलाने वाला कोई संगठित सांस्कृतिक इंजन नहीं है, न कोई हिंदी ‘इंटरनेट स्लैंग फैक्ट्री’, न कोई संस्था जो नए शब्दों को हवा दे. फिर भी आप देखें की फिल्मों के जरिये ‘झकास’, ‘सेटिंग’, ‘पंगा’, ‘जुगाड़’ जैसे शब्द पहले ही हिंदी से निकलकर राष्ट्रीय मुहावरे बन चुके हैं.
लेखक वसीम अकरम का कहना है कि शुद्धता का मानक एक बहस का विषय है. किसी को कुछ पसंद होता है तो किसी दूसरे को कुछ और पसंद आता है. उसी तरह से भाषा के लिए भी लोग अपने-अपने नजरिए से शब्दों का चयन करते हैं. इसलिए मेरे लिए शुद्ध हिंदी वह नहीं है, जिसमें दूसरी भाषाओं के एक भी शब्द न हों, बल्कि वह है, जिसमें विचार स्पष्ट, अभिव्यक्ति सहज और भाव सच्चे हों. शब्द तो अभिव्यक्त करने के लिए ही होते हैं.
वे कहते हैं कि यदि हिंदी बोलते समय हम किसी और भाषा के किसी एक शब्द को बरतते हैं और सामने वाला उससे संतुष्ट हो जाता है तो यह भी भाषा की शुद्धता का एक मानक हो सकता है. लेकिन अगर हम शुद्ध हिंदी बोलें और किसी को समझ में ही न आए तो ऐसी शुद्धता भी किसी काम की नहीं है.
नवीन चौधरी के नजरिए से ‘शुद्ध हिंदी’ एक कल्पना है, वास्तविकता नहीं. उनका मानना है कि हिंदी खुद संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, फारसी, अरबी, तुर्की और अंग्रेजी के मिश्रण से बनी है. ‘आम’, ‘कुर्सी’, ‘किताब’, ‘स्कूल’ जैसे हमारे रोजमर्रा के हजारों शब्द किसी और भाषा से आए हैं, हम उन्हें ‘अशुद्ध’ नहीं मानते. भाषा नदी की तरह होती है जो बहती है, वह मिट्टी और पानी दोनों साथ ले जाती है. जो रुक जाती है, वही ठहरा हुआ तालाब बनकर सड़ती है.
लेखक अमित गुप्ता कहते हैं कि ‘शुद्ध हिंदी’ जैसा कोई स्थिर पैमाना होता ही नहीं है. भाषाएं तब तक ही जिंदा रहती और बढ़ती हैं, जब तक वे दूसरों से शब्द उधार लेती हैं और बदलावों के लिए तैयार रहती हैं. जो भाषा किसी भी बाहरी शब्द को आने से रोकेगी, उसकी वृद्धि रुक जाएगी. इसलिए हिंदी का निरंतर बदलते रहना और नए शब्दों को समाहित करना ही उसकी असल प्रकृति है.
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डीसीएच/एबीएम