
नई दिल्ली, 23 सितंबर . Supreme Court ने बुधवार को पटना हाई कोर्ट के उस फैसले का स्वतः संज्ञान लिया, जिसमें दुष्कर्म की कोशिश के एक दोषी व्यक्ति को बरी कर दिया गया था. हाई कोर्ट ने कहा था कि पीड़िता और खुद के कपड़े उतारना और उसके साथ शारीरिक छेड़छाड़ करना रेप की कोशिश के बजाय आईपीसी की धारा 354 के तहत महिला की गरिमा भंग करने का अपराध बनता है.
भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की पीठ ने स्वतः संज्ञान मामले में नोटिस जारी किया. पीठ ने संकेत दिया कि वह पटना हाई कोर्ट के फैसले में की गई विवादित टिप्पणियों की जांच करेगी.
सुनवाई के दौरान सीजेआई की अध्यक्षता वाली पीठ ने बिहार के महाधिवक्ता एसडी संजय से कहा, ”इसमें कुछ आपत्तिजनक टिप्पणियां हैं.”
पीठ ने कहा कि आरोपी को सुनने के बाद ही Supreme Court इन टिप्पणियों को हटा सकता है. कोर्ट ने बिहार सरकार को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि स्थानीय पुलिस के जरिए संबंधित आरोपी को Supreme Court का नोटिस दिया जाए.
मामले को सुओ मोटो रिट पिटीशन (क्रिमिनल) नंबर 5 ऑफ 2026 के रूप में दर्ज किया गया है. यह मामला सीजेआई के निर्देश पर दर्ज किया गया. इससे पहले Supreme Court ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक फैसले से जुड़े स्वतः संज्ञान मामले में रेप की तैयारी और रेप की कोशिश के बीच अंतर को लेकर फैसला दिया था.
पटना हाई कोर्ट का यह फैसला हिमांशु कुमार पाठक उर्फ मिथिया पाठक की अपील पर आया था. निचली अदालत ने उसे बिहार के बांका जिले के अमरपुर पुलिस थाने में 2008 में दर्ज एक मामले में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 376/511 और 342 के तहत दोषी ठहराया था.
अभियोजन पक्ष के अनुसार, पीड़िता 19 जनवरी 2008 को अपने पिता के साथ अमरपुर स्थित आरोपी के फोटोग्राफी स्टूडियो गई थी. उसकी तस्वीर लेने के बाद आरोपी ने कथित तौर पर उसके पिता को कंप्यूटर पर तस्वीर देखने के लिए कहा और स्टूडियो का दरवाजा अंदर से बंद कर लिया.
पीड़िता ने आरोप लगाया कि आरोपी ने दुष्कर्म के इरादे से उसके कपड़े उतारने की कोशिश की, अपने कपड़े उतारे और उसके साथ शारीरिक छेड़छाड़ की. पीड़िता के शोर मचाने पर उसके पिता दरवाजे के पास पहुंचे. इसके बाद आरोपी ने दरवाजा खोला और स्टूडियो से भाग गया.
निचली अदालत ने बाद में आरोपी को दोषी ठहराते हुए आईपीसी की धारा 376/511 के तहत तीन साल के कठोर कारावास और धारा 342 के तहत छह महीने की जेल की सजा सुनाई थी. दोनों सजाएं एक साथ चलनी थीं.
हालांकि, पटना हाई कोर्ट ने 9 जुलाई को दिए अपने फैसले में सबूतों का दोबारा मूल्यांकन किया और कहा कि अभियोजन पक्ष दुष्कर्म की कोशिश के लिए जरूरी तथ्यों को साबित करने में नाकाम रहा.
जस्टिस पूर्णेंदु सिंह की एकल पीठ ने कहा था कि पेनिट्रेशन का कोई सबूत नहीं था और अभियोजन पक्ष ने दुष्कर्म की कोशिश के आरोप के समर्थन में कोई मेडिकल सबूत भी पेश नहीं किया.
हाई कोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि मामले की जांच पूरी कर चार्जशीट दाखिल करने वाले जांच अधिकारी से मुकदमे के दौरान पूछताछ नहीं की गई थी.
हाई कोर्ट ने कहा कि आरोपी ने पीड़िता को स्टूडियो के अंदर रोका, दरवाजा बंद किया, उसके कपड़े उतारने की कोशिश की और उसके साथ शारीरिक छेड़छाड़ की.
हाई कोर्ट ने कहा, ”इन हरकतों से साफ तौर पर साबित होता है कि महिला के खिलाफ आपराधिक बल का इस्तेमाल उसकी गरिमा भंग करने के इरादे से या कम से कम यह जानते हुए किया गया कि इन हरकतों से उसकी गरिमा भंग हो सकती है, इसलिए ये कृत्य आईपीसी की धारा 354 के आवश्यक तत्वों को पूरा करते हैं.”
हाई कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि सभी आरोपों को पूरी तरह सही मान लेने पर भी वे साफ तौर पर आईपीसी की धारा 376 के साथ धारा 511 के तहत दुष्कर्म की कोशिश का अपराध साबित नहीं करते.
हाई कोर्ट के अनुसार, यह मामला आईपीसी की धारा 354 के दायरे में आता है, जो महिला की गरिमा भंग करने के इरादे से उस पर हमला करने या आपराधिक बल का इस्तेमाल करने से संबंधित है.
इसके बाद पटना हाई कोर्ट ने निचली अदालत के दोषसिद्धि और सजा के फैसले को रद्द करते हुए अपीलकर्ता को सभी आरोपों से बरी कर दिया. हाई कोर्ट ने आरोपी की ओर से जमा किए गए किसी भी जुर्माने को वापस करने का भी निर्देश दिया.
Supreme Court की ताजा कार्यवाही से पहले 14 जुलाई को शीर्ष अदालत ने रेप की कोशिश से जुड़े एक अन्य स्वतः संज्ञान मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर निर्णय दिया था.
उस मामले में Supreme Court ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया था, जिसमें कहा गया था कि एक नाबालिग के खिलाफ आरोप प्रथम दृष्टया दुष्कर्म की कोशिश का मामला नहीं बनाते.
शीर्ष अदालत ने ‘तैयारी’ और ‘कोशिश’ के बीच अंतर को भी दोहराया था. कोर्ट ने कहा था कि तैयारी पूरी होने के तुरंत बाद कोशिश का चरण शुरू हो जाता है और उस मामले में आरोपी का कथित व्यवहार यह दिखाता है कि वह तैयारी के चरण से आगे बढ़ चुका था.
Supreme Court ने राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी को एक विशेषज्ञ समिति बनाने का भी निर्देश दिया था. इस समिति को यौन अपराधों और कमजोर स्थिति वाले पीड़ितों, शिकायतकर्ताओं तथा गवाहों से जुड़े अन्य संवेदनशील मामलों को संभालते समय न्यायिक संवेदनशीलता और जजों तथा न्यायिक व्यवस्था के दृष्टिकोण पर दिशानिर्देश तैयार करने को कहा गया था.
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एएमटी/डीकेपी