
नई दिल्ली, 1 जुलाई . अयोध्या स्थित श्रीराम मंदिर के चढ़ावा चोरी मामले में सभी आरोपियों को कानून के अनुसार दंड मिलने पर ही समस्या का समाधान होगा और चंदा चोरी से आहत हिंदुओं के दिल को सुकून मिल सकेगा. विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने कहा कि चढ़ावा चोरी की खबर सामने आने से देशभर के हिंदुओं को गहरी ठेस पहुंची है और वे बेहद आहत हैं.
से आलोक कुमार ने कहा कि जांच पूरी करने के लिए स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (एसआईटी) को 15 दिन का अतिरिक्त समय देने में कुछ भी गलत नहीं है. उन्होंने कहा कि अगर जांच करने वालों ने जांच को अच्छी तरह से करने और किसी नतीजे तक पहुंचने के लिए और समय मांगा है, तो इस मांग को गलत नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि जांच आगे बढ़ रही है और इसे बिना किसी फालतू दखल के जारी रहने देना चाहिए.
आलोक कुमार ने कहा कि एसआईटी जांच कर रही है. हमने सुना है कि यह जांच अच्छे से और पूरी बारीकी से की जा रही है. इसलिए, हमें जांच की सामान्य प्रक्रियाओं पर भरोसा रखना चाहिए. कुछ लोग कहते हैं कि भाजपा सरकार निष्पक्ष जांच नहीं होने देगी, इसलिए मामला सीबीआई को सौंप देना चाहिए लेकिन केंद्र सरकार भी भाजपा की ही है. जो विपक्षी पार्टियां यूपी पुलिस पर सवाल उठाती हैं, वे सीबीआई पर भी सवाल उठाती हैं. मेरा मानना है कि हमें अपनी एजेंसियों पर अविश्वास नहीं करना चाहिए. मीडिया और पूरा हिंदू समाज इस जांच पर नजर रखे हुए है. अगर कुछ भी गलत होता है, तो वह सामने आ जाएगा. इसीलिए मैं सहमत नहीं हूं कि जांच एजेंसी बदली जाए या बढ़ाई जाए.
जब उनसे यह पूछा गया कि अयोध्या बार एसोसिएशन ने ऐलान किया है कि राम मंदिर चढ़ावा चोरी के कथित मामले में कोई वकील आरोपियों का पक्ष नहीं रखेगा. आलोक कुमार ने जवाब देते हुए कहा कि मुझे यह बात थोड़ी अजीब लगी. चढ़ावा चोरी के आरोपियों के लिए मेरे मन में कोई सहानुभूति नहीं है. असल में, मैं तो उन्हें सपने में भी जेल में ही देखता हूं. हालांकि Supreme Court ने इस मामले पर विचार करने के बाद कहा कि संविधान के अनुच्छेद 22 के तहत कानूनी मदद हर आरोपी का मौलिक अधिकार है. इसी आधार पर कोर्ट ने कहा कि संवैधानिक, कानूनी और नैतिक रूप से, कोई बार एसोसिएशन ऐसा प्रस्ताव पास नहीं कर सकती और न ही कोई वकील केस लेने से इनकार कर सकता है.
गोपाल राव द्वारा राम मंदिर के मैनेजर के तौर पर काम कर रहे हैं या उन्हें पद से हटा दिया गया है, इसके जवाब में आलोक कुमार ने कहा कि उन्हें नहीं पता कि राव की कोई औपचारिक नियुक्ति थी या नहीं. वहीं, जिन लोगों के नाम सामने आ रहे हैं, वे खुद तय करेंगे कि उन्हें अपने पदों पर बने रहना चाहिए या नहीं. जब यह कहा गया कि चंपत राय के महासचिव पद पर बने रहने से जांच प्रभावित हो सकती है, गवाहों पर दबाव डाला जा सकता है या सबूतों के साथ छेड़छाड़ हो सकती है, तो एफआईआर दर्ज होने के दो दिन के भीतर ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया. इस बात की सराहना की जानी चाहिए.
उन्होंने इस सुझाव को भी खारिज कर दिया कि मामले की जांच के लिए सर्वदलीय समिति बनाई जानी चाहिए; उन्होंने कहा कि ऐसे प्रस्ताव का मतलब असल में जांच को राजनीतिक नेताओं के हाथों में सौंपना होगा.
उन्होंने कहा कि क्या किसी व्यक्ति का मीडिया ट्रायल होना चाहिए? चुनाव आ रहे हैं, तो इसलिए पगड़ी उछाली जानी चाहिए क्योंकि चुनाव नजदीक हैं. मर्यादा की सीमाएं तोड़ी जा रही हैं. बड़े-बड़े नेता भी दावा कर रहे हैं कि 2,000 करोड़ रुपए की चोरी हुई है. पुलिस को उन्हें एक बार बुलाकर पूछना चाहिए कि उनके पास क्या सबूत हैं. अगर कोई सबूत नहीं है, तो ऐसे बयान देना और अफवाहें फैलाना, जिनसे सनसनी, असंतोष और हिंसा फैल सकती है, बीएनएस की धारा 353 के तहत अपराध है.
कोर्ट का जिक्र करते हुए आलोक कुमार ने कहा कि किसी भी मामले में कोर्ट ही फैसला ही अंतिम होता है. हमें फैसला सुनाने का अधिकार किसने दिया है. यह सच है कि कुछ लोगों को सीसीटीवी में ऐसी हरकतें करते हुए देखा गया है. यह सबूत है और कुछ लोगों ने कबूल भी किया है. इसलिए ऐसा लगता है कि उन्होंने ही ऐसा किया होगा लेकिन भारत की व्यवस्था में अंतिम फैसला कोर्ट का ही होता है.
उन्होंने राम मंदिर मामले में पुलिस जांच से जुड़ी जानकारी मीडिया में लीक होने की खबरों पर कहा कि कोई इन लीक तथ्यों की खबरें बना रहा है और उन्हें फैला रहा है. अगर कोई खबर होती है, तो वे उसे दिखाते हैं. अगर खबर नहीं होती, तो वे उसे मनगढ़ंत तरीके से पेश करते हैं. लीक हो रही खबरों में से कितनी सच हैं और कितनी राजनीतिक, यह मुझे नहीं पता है.
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डीकेएम/पीएम