महिला आरक्षण बिल पहले से पास है तो उसे लागू क्यों नहीं कर रही सरकार: हन्नान मोल्लाह

नई दिल्ली, 15 अगस्त . सीपीआईएम के वरिष्ठ नेता हन्नान मोल्लाह ने केंद्र सरकार पर निशाना साधा. महिला आरक्षण बिल को लेकर उन्होंने कहा कि बिल पास तो हो गया, लेकिन आज तक लागू नहीं किया गया और अब इसके साथ डिलिमिटेशन जोड़कर जनता को गुमराह करने की साजिश हो रही है.

उन्होंने आरोप लगाया कि डिलिमिटेशन के बाद संसद ‘अपराधियों का अड्डा’ बन जाएगी. इसके साथ ही पीएम मोदी के ‘दिमागी नक्सली’ वाले बयान पर मोल्लाह ने कहा कि असली दिमागी बर्बरता धर्म के नाम पर हिंसा फैलाना है.

उन्होंने कहा, “मैं 80 साल का हो गया. 40 साल सदन में था, अभी भी राजनीति से जुड़ा हूं. आजकल की राजनीति इतने निचले स्तर पर जा चुकी है, इतना झूठ और फरेब है, लाल किले का भाषण आजकल मैं सुनता ही नहीं हूं. सिर्फ झूठ का प्रचार किया जाता है.”

उन्होंने महिला आरक्षण को लेकर कहा कि महिला रिजर्वेशन बिल अचानक से पास हो गया, लेकिन आज तक इसे लागू नहीं किया गया. जब बिल पास हो गया तो सरकार की जिम्मेदारी है इसे लागू करना, जो सरकार ने नहीं किया. अभी इसके साथ डिलिमिटेशन को जोड़ दिया गया है. उसके पीछे का मकसद बुरा है.

दक्षिण भारत में लोग आज जिस सभ्यता से जिंदगी बिताते हैं, शिक्षा, संस्कृति, इंसानियत का विकास, लोकतांत्रिक मूल्य ज्यादा है, इसलिए इस क्षेत्र की जनसंख्या कम है. जहां, अनपढ़ और अंधभक्ति है, सांप्रदायिकता है, महिलाओं की इज्जत नहीं है, वहां आबादी बढ़ती जा रही है. पहले से ही संसद में 125-130 लोगों के खिलाफ बलात्कार के मामले हैं, डिलिमिटेशन के बाद ये और भी बढ़ेगा. संसद ज्यादा से ज्यादा अपराधियों का अड्डा बनेगा, चर्चा नहीं होगी, फैसला नहीं होगा. डिलिमिटेशन का मतलब संसद को विकसित करना नही, खत्म करना है. ये झूठ बोलकर जनता को गुमराह करने की साजिश है.

पीएम मोदी के दिमागी नक्सली वाले बयान पर उन्होंने कहा कि असल में दिमागी बर्बरता कहां है? उन्होंने कहा कि मैंने देखा है कि युवाओं को कैसे हथियारों की ट्रनिंग दी जा रही है. कोई भी लोकतांत्रिक संगठन ऐसा नहीं कर सकता है.

उन्होंने कहा कि हमारे देश में दिमागी बर्बरता है कि धर्म के नाम पर दूसरे धर्म पर हमला करना. इस तरह के दिमागी बर्बरता को प्रतिष्ठित करने की कोशिश हो रही है. दिमाग में बर्बरता, हिंसा भरने की कोशिश की जा रही है. इंसान को जानवर बनाने की कोशिश की जा रही है. इस परिस्थिति में उसके खिलाफ जो आवाज उठाता है, उसे दिमागी नक्सल कहा जा रहा है.

केके/डीकेपी