डीपफेक और डिजिटल उत्पीड़न का असर, महिलाएं सार्वजनिक मंचों से बना रहीं दूरी: अध्ययन में खुलासा

नई दिल्ली, 30 अप्रैल . वैश्विक शोधकर्ताओं की एक टीम ने गुरुवार को आगाह किया कि डीपफेक, एआई-सहायता प्राप्त यौन उत्पीड़न और बढ़ती ऑनलाइन हिंसा महिलाओं पर नाकारात्मक असर डाल रही हैं. इसके चलते कई महिलाएं सार्वजनिक जीवन से दूरी बनाने को मजबूर हो रही हैं.

यूएन वीेमेन, सिटी सेंट जॉर्ज्स (यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन) और डेटा फोरेंसिक कंपनी दनर्व की संयुक्त रिपोर्ट में पाया गया कि सार्वजनिक जीवन में सक्रिय महिलाओं के खिलाफ ऑनलाइन हिंसा अब तकनीकी रूप से अधिक जटिल और संगठित हो गई है. जिसका असर महिलाओं के जीवन पर पड़ रहा है.

रिपोर्ट की प्रमुख लेखिका और सिटी सेंट जॉर्ज के सेंटर फॉर जर्नलिज्म एंड डेमोक्रेसी की चेयर जूली पोजैट्टी ने कहा कि एआई-सर्पोटेड “वर्चुअल रेप” अब अपराधियों के हौसले बुलंद कर रहा है. ये उनके लिए आसानी से उपलब्ध है, जिससे ऑनलाइन हिंसा और तेजी से बढ़ रही है.

उन्होंने कहा, “यह प्रवृत्ति महिलाओं के अधिकारों में गिरावट को बढ़ावा देती है और दमन चक्र को और बढ़ाती है. खासकर ऐसे दौर में ऐसे माहौल में, जहां सत्ता सख्त है, लोकतंत्र कमजोर पड़ रहा है और महिलाओं के खिलाफ नफरत संगठित रूप से फैल रही है, यह हिंसा महिलाओं से मुश्किल से हासिल किए गए अधिकारों को छीनती है.”

अध्ययन में 119 देशों की 641 महिला पत्रकारों, मीडिया कर्मियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और मानवाधिकार रक्षकों के अनुभवों का विश्लेषण किया गया. सर्वेक्षण 2025 के अंत में किया गया था.

रिपोर्ट के अनुसार, 27 फीसदी महिलाओं को अवांछित यौन संदेश या सामग्री का सामना करना पड़ा, 12 फीसदी की निजी तस्वीरें बिना अनुमति साझा की गईं, और 6 फीसदी महिलाएं डीपफेक या मॉर्फ्ड कंटेंट का शिकार बनीं.

इन वजहों से मानसिक स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक असर पड़ा. 24 फीसदी ने चिंता या अवसाद का अनुभव किया, 13 फीसदी को पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (पीटीएसडी) का सामना करना पड़ा और 41 फीसदी ने सोशल मीडिया पर खुद को सीमित कर लिया.

रिपोर्ट की सह-लेखिका लिया हेलमुलर ने कहा कि ऑनलाइन हिंसा का असर महिलाओं की सार्वजनिक भागीदारी को कम कर रहा है और कई मामलों में उन्हें पीछे हटने के लिए मजबूर कर रहा है.

केआर/