
नई दिल्ली, 20 मई . नॉर्वे के पूर्व जलवायु एवं पर्यावरण मंत्री एरिक सोल्हेम ने बुधवार को कहा कि भारत और नॉर्वे के बीच बढ़ती ग्रीन स्ट्रैटेजिक साझेदारी वैश्विक जलवायु सहयोग के लिए एक व्यावहारिक और बड़े स्तर पर लागू किए जा सकने वाला मॉडल पेश करती है.
सोल्हेम ने इंडिया नैरेटिव के लिए लिखे एक लेख में कहा कि यह साझेदारी दोनों देशों की पूरक ताकतों को साथ लाती है, जिसमें नॉर्वे के वित्तीय संसाधन और तकनीकी विशेषज्ञता के साथ भारत के बड़े पैमाने और क्षमता का मेल शामिल है.
उन्होंने कहा कि मौजूदा समय में जब दुनिया जलवायु संकट, भू-राजनीतिक तनाव और द्विपक्षीय सहयोग की कमी जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है, तब भारत-नॉर्वे साझेदारी साझा उद्देश्य के साथ आगे बढ़ रही है. उनका कहना था कि यह सहयोग उन क्षेत्रों पर केंद्रित है जो वैश्वीकरण के अगले चरण के लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं.
सोल्हेम ने कहा कि नॉर्वे की संप्रभु संपत्ति और औद्योगिक विशेषज्ञता भारत को अपने महत्वाकांक्षी लक्ष्यों को तेजी से हासिल करने में मदद कर सकती है, जिनमें 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य और ग्रीन हाइड्रोजन को तेजी से बढ़ावा देना शामिल है.
पूर्व मंत्री ने कहा कि ऊर्जा संसाधनों के जिम्मेदार प्रबंधन में नॉर्वे के दशकों के अनुभव, मजबूत वित्तीय क्षमता और बड़े स्तर पर बदलाव को समर्थन देने वाली तकनीकी दक्षता भारत के ऊर्जा परिवर्तन में मददगार साबित हो सकती है.
उन्होंने कहा, “नॉर्वे की कंपनियां पहले से ही ऑफशोर पवन ऊर्जा, जलविद्युत और समुद्री क्षेत्र के डीकार्बोनाइजेशन में सक्रिय हैं. ये ऐसे क्षेत्र हैं जो भारत के भविष्य के लिए सीधे तौर पर महत्वपूर्ण हैं. यह पारंपरिक अर्थों में सहायता नहीं, बल्कि रणनीतिक तालमेल है.”
सोल्हेम ने ग्रीन शिपिंग को उन सबसे कठिन क्षेत्रों में बताया जिनका डीकार्बोनाइजेशन करना चुनौतीपूर्ण है. उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में नॉर्वे अग्रणी बनकर उभरा है.
उन्होंने आगे कहा कि भारत अपनी लंबी तटरेखा और तेजी से बढ़ते व्यापार नेटवर्क के कारण ग्रीन शिपिंग से जुड़ी नई तकनीकों के लिए परीक्षण स्थल और बड़े पैमाने पर विस्तार का अवसर प्रदान करता है.
सोल्हेम के अनुसार, भारतीय बंदरगाहों को वैश्विक मार्गों से जोड़ने वाला ग्रीन शिपिंग कॉरिडोर न केवल उत्सर्जन कम करेगा, बल्कि टिकाऊ व्यापार के संचालन के तरीके को भी नई दिशा देगा.
उन्होंने कहा कि वैश्विक जलवायु सहयोग अक्सर ऐतिहासिक जिम्मेदारी और वित्तीय दायित्वों की बहस में उलझ जाता है, लेकिन भारत और नॉर्वे एक अधिक व्यावहारिक मॉडल को आगे बढ़ा रहे हैं. यह मॉडल बोझ बांटने की बजाय साझा हितों और प्रोत्साहनों को एक साथ जोड़ने पर आधारित है.
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