
मुंबई, 28 जुलाई . हिंदी सिनेमा के हास्य कलाकार जॉनी वॉकर को कौन नहीं जानता? उन्होंने अपनी हास्य कलाकारी से न सिर्फ लोगों को गुदगुदाया बल्कि उनके चेहरे पर मुस्कान बिखेरी. लंबी बीमारी के कारण 29 जुलाई 2003 को उनका निधन हो गया था. उन्होंने लगभग 300 फिल्मों में काम करने के साथ ही बॉलीवुड में कॉमेडी की एक खास परंपरा स्थापित की.
11 नवंबर 1926 को इंदौर में जन्मे जॉनी वॉकर का असली नाम बदरुद्दीन जमालुद्दीन था. अभिनय की दुनिया में आने के बाद अभिनेता गुरुदत्त ने बदरुद्दीन जमालुद्दीन से उनका नाम बदलकर जॉनी वॉकर कर दिया था. गुरुदत्त ने उनका यह नाम एक शराब के ब्रांड पर रखा था. खास बात यह है कि भले ही वे फिल्मों में शराबी का किरदार निभाते थे लेकिन उन्होंने कभी शराब को हाथ नहीं लगाया.
जॉनी वॉकर की कॉमेडी कभी अश्लील या घटिया नहीं होती थी बल्कि लोगों के जीवन से जुड़ी होती थी. गुरुदत्त की फिल्मों प्यासा, कागज के फूल, चौदहवीं का चांद, मिस्टर एंड मिसेज 55 जैसी क्लासिक फिल्मों में उनके रोल आज भी याद किए जाते हैं. आंखों में तुम हो, मधुमती, चोरी चोरी जैसी फिल्मों में भी उन्होंने अपनी छाप छोड़ी.
जॉनी वॉकर जब मुंबई आए थे तो शुरुआती दिनों में उन्होंने बस कंडक्टर का काम किया था. उनको महीने के 26 रुपए वेतन मिलते थे. बस कंडक्टरी का काम करने के दौरान भी उन्होंने एक्टिंग करना नहीं छोड़ा था. बस में सफर करने के साथ ही वे अपनी कॉमेडी से लोगों का मनोरंजन करते थे.
वर्ष 1955 में उन्होंने अभिनेत्री नूरजहां से निकाह किया था. दोनों के छह बच्चे हैं. उन्होंने अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा दिलाने पर विशेष ध्यान दिया और उन्हें अमेरिका भेजा था.
उन्होंने ‘जाल,’ ‘आंधियां,’ ‘नया दौर,’ ‘टैक्सी ड्राइवर,’ ‘मधुमती,’ ‘कागज के फूल,’ ‘गेटवे ऑफ इंडिया,’ ‘मिस्टर एक्स,’ ‘मेरे महबूब’ और ‘सीआईडी’ जैसी हिट फिल्मों में अपने अभिनय से सबको हंसाया. वर्ष 1959 में पहली ‘मधुमती’ में सहायक अभिनेता के लिए उनको पहला फिल्मफेयर अवार्ड मिला था. इसके बाद ‘शिकार’ के लिए उन्हें बेस्ट कॉमिक एक्टर के फिल्मफेयर भी मिला. 29 जुलाई, 2003 को उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया.
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एसडी/पीएम