
नई दिल्ली, 27 जून . दिल्ली के उप-राज्यपाल टीएस संधू शनिवार को आईआईएम-रोहतक के एक कार्यक्रम में शामिल हुए, जहां उन्होंने मैनेजमेंट के युवा छात्रों से कहा कि भरोसा जगाने वाले लीडर बनने के लिए उन्हें सबसे पहले खुद पर विश्वास करना चाहिए.
संधू ने आईआईएम-रोहतक में एक कार्यक्रम में बोलते हुए कहा, “जैसा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है: ‘नेता बनने के लिए, आपको पहले खुद पर भरोसा करना होगा; लीडरशिप का मतलब है सोच और बातचीत में स्पष्टता, न कि अपना अधिकार थोपना.'”
उन्होंने संस्थान के उद्घाटन और ओरिएंटेशन प्रोग्राम 2026 में कहा कि ये बातें मैनेजमेंट की पढ़ाई के लिए बहुत जरूरी हैं. लीडरशिप भरोसे, हालात के हिसाब से ढलने की क्षमता और दूसरों पर भरोसा जगाने की काबिलियत से आती है.
देश की तरक्की का जिक्र करते हुए संधू ने कहा कि भारत के विकास का रास्ता कुछ खास जिम्मेदारियां भी पैदा करता है.
संधू ने कहा, “हम एक साथ बड़े पैमाने पर इंफ्रास्ट्रक्चर बना रहे हैं, डिजिटल सिस्टम का विस्तार कर रहे हैं, मैन्युफैक्चरिंग को मजबूत कर रहे हैं, फाइनेंशियल इन्क्लूजन को बढ़ा रहे हैं और दुनिया की सबसे युवा आबादी में से एक की उम्मीदों को पूरा कर रहे हैं.
भारत में मैनेजमेंट से जुड़ा कोई फैसला शायद ही कभी सिर्फ बिजनेस का फैसला होता है. इसका असर रोजगार, सामाजिक गतिशीलता, शहरीकरण और सार्वजनिक नतीजों पर भी पड़ सकता है.”
उन्होंने कहा कि सरकारी और प्राइवेट क्षेत्रों के बीच का फर्क तेजी से मिट रहा है. टेक्नोलॉजी, हेल्थकेयर, लॉजिस्टिक्स, शिक्षा, गवर्नेंस और बिजनेस लगातार एक-दूसरे से जुड़ रहे हैं, इसलिए संस्थानों को ऐसे लोगों की जरूरत है, जो अलग-अलग सेक्टरों के बारे में सोच सकें, न कि सिर्फ अपने दायरे में सिमटे रहें.
संधू ने कहा कि मैनेजमेंट का मतलब अब सिर्फ टेक्निकल समाधान खोजना नहीं है. यह सही फैसला लेने की क्षमता के बारे में है, यानी अलग-अलग प्राथमिकताओं के बीच संतुलन बनाना, अनिश्चितता का सामना करना और ऐसे हालात में फैसले लेना, जहां दक्षता और स्थिरता हमेशा एक-दूसरे के साथ मेल न खाती हों.
उन्होंने कहा, “सही फैसला लेने की क्षमता सीधे तौर पर सिखाई नहीं जा सकती. यह जटिलताओं को समझने, अलग-अलग नजरियों को जानने और ऐसे हालात का बार-बार सामना करने से विकसित होती है, जिनका कोई जवाब नहीं होता.”
संस्थान में आने वाले छात्रों से बात करते हुए संधू ने कहा, “मैं नए छात्रों से यही कहूंगा कि इस समय का इस्तेमाल सिर्फ किसी पेशे के लिए तैयारी करने में ही न करें, बल्कि अपनी सोच का दायरा बढ़ाने में भी करें.”
उन्होंने कहा कि अगले दो वर्ष तेजी से बीत जाएंगे. इनका इस्तेमाल बौद्धिक अनुशासन विकसित करने, जटिलताओं को समझने और फैसले लेने की क्षमता बढ़ाने में करें और हर समस्या को सिर्फ तुरंत मिलने वाले नतीजों के नजरिए से न देखें.
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डीके/डीकेपी