‘मनुष्य को ऐसे कर्म करने चाहिए जो हृदय में प्रेम, सौहार्द्र और सद्भाव को बढ़ाएं’, प्रधानमंत्री मोदी ने साझा किया सुभाषित

नई दिल्ली, 15 सितंबर . प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सामाजिक सौहार्द और मानवीय मूल्यों का संदेश देते हुए सोशल मीडिया पर सुभाषित शेयर किया है. इस वैदिक मंत्र के माध्यम से उन्होंने प्रेम, सद्भाव और आपसी भाईचारे की भावना को मजबूत करने की अपील की. उन्होंने कहा कि समाज में ऐसे कर्म होने चाहिए जो लोगों के हृदयों को जोड़ें और परस्पर स्नेह को बढ़ावा दें.

पीएम की ओर से सोशल मीडिया पर, “सहृदयं सांमनस्यमविद्वेषं कृणोमि वः. अन्यो अन्यमभि हर्यत वत्सं जातमिवाघ्न्या॥” मंत्र शेयर किया गया है. जिसका हिंदी अर्थ है कि मनुष्य को ऐसे कर्म करने चाहिए जो हृदय में प्रेम, सौहार्द्र और सद्भाव को बढ़ाएं. सभी को एक-दूसरे के प्रति उसी प्रकार से स्नेह और आत्मीयता रखनी चाहिए, जिस प्रकार गाय अपने नवजात बछड़े से प्रेम करती है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर शेयर यह वैदिक मंत्र अथर्ववेद के तीसरे कांड के 30वें सूक्त का पहला मंत्र है. इस मंत्र के माध्यम से ईश्वर कहते हैं, “हे मनुष्यो! मैं तुम्हारे बीच ऐसे वचनों और कर्मों की स्थापना करता हूं जिससे तुम सहृदय (एक जैसा हृदय रखने वाले), सांमनस्य (समान मन वाले), और अविद्वेष (द्वेष या ईर्ष्या से रहित) बनो. तुम एक-दूसरे से इस प्रकार प्रेम करो, जैसे कोई गाय अपने नवजात बछड़े से अगाध स्नेह करती है.”

यह मंत्र परिवार, समाज और राष्ट्र के लोगों के बीच मतभेद मिटाकर एक सूत्र में बंधने की प्रेरणा देता है. गाय और बछड़े के उदाहरण से समझाया गया है कि जैसे गाय बिना किसी स्वार्थ और शर्त के बछड़े से प्रेम करती है, वैसे ही मनुष्यों को भी एक-दूसरे से प्रेम करना चाहिए. इस मंत्र का मूल सार यही है कि सबका उद्देश्य और विचार एक-दूसरे के हित में हो. यही वैदिक प्रार्थना का मूल सार है.

एसडी/एएस