
नई दिल्ली, 5 अगस्त . उद्धव ठाकरे की शिवसेना बनाम एकनाथ शिंदे की शिवसेना मामले में पार्टी और चुनाव निशान पर अधिकार को लेकर उद्धव गुट की याचिका पर Supreme Court में सुनवाई हुई. सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने मामले की सुनवाई की. इस मामले में अगली सुनवाई गुरुवार दोपहर 2 बजे होगी.
सुनवाई के दौरान उद्धव ठाकरे की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने दलीलें रखीं. उन्होंने कहा कि बालासाहेब ठाकरे स्थापना से लेकर 2012 में निधन तक पार्टी के प्रमुख रहे. उनके बाद उनके बेटे उद्धव ठाकरे ने जिम्मेदारी संभाली और पार्टी संविधान के अनुसार कई बार अध्यक्ष चुने गए. एकनाथ शिंदे उस समय उद्धव के सहायक थे. पार्टी में भी और जब उद्धव मुख्यमंत्री बने तब भी.
सिब्बल ने कोर्ट को बताया कि 1999 तक शिवसेना के संविधान में ‘पक्ष प्रमुख’ का पद नहीं था. यह पद बाद में जोड़ा गया. उन्होंने 2012 के बाद हुए विधानसभा चुनाव का ब्योरा देते हुए कहा कि 2014 से 2019 तक शिवसेना सरकार में थी और एकनाथ शिंदे उसमें मंत्री थे. इस दौरान उन्होंने कभी कोई शिकायत नहीं की. सितंबर 2018 में तत्कालीन सीएम उद्धव ठाकरे ने एकनाथ शिंदे को विधानसभा में शिवसेना का ग्रुप नेता और सुनील प्रभु को चीफ व्हिप नियुक्त किया था. विधान परिषद चुनाव में जब शिवसेना के विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की तो कार्रवाई की नौबत आई. इसके बाद बागी विधायकों ने सुनियोजित तरीके से पहले सूरत और फिर गुवाहाटी का रुख किया.
सिब्बल के मुताबिक, पार्टी संविधान के अनुच्छेद 11ए के तहत की गई इन नियुक्तियों की जानकारी विधानसभा अध्यक्ष और चुनाव आयोग को विधिवत दी गई थी. उन्होंने कहा कि हमने संविधान के अनुच्छेद का उल्लेख भी किया था. लेकिन आयोग 2018 में कहता है कि उनके पास वह संविधान रिकॉर्ड में नहीं है. बाद में उद्धव ठाकरे निर्विरोध अध्यक्ष चुने गए और उन्होंने फिर से एकनाथ शिंदे को नेता नियुक्त किया.
सिब्बल ने तर्क दिया कि दोनों पक्ष इस बात पर सहमत हैं कि नियुक्तियां उसी संविधान के तहत हुई थीं जिसे कभी चुनौती नहीं दी गई. उन्होंने कहा कि एकनाथ शिंदे राष्ट्रीय कार्यकारिणी का हिस्सा थे और उन्हें पक्ष प्रमुख ने ही नियुक्त किया था. पार्टी नेतृत्व ने उम्मीदवार तय किए और चुनाव लड़े. 2019 के लोकसभा चुनाव में शिवसेना ने 18 सीटें जीतीं. ये सभी चुनाव 2013 और 2018 के संविधान के तहत लड़े गए.
सिब्बल ने कहा कि चुनाव आयोग यह तय नहीं कर सकता कि पार्टी का संविधान वैध है या नहीं. 2019 से 2022 तक उद्धव मुख्यमंत्री और शिंदे कैबिनेट मंत्री रहे. इस दौरान कभी यह मुद्दा नहीं उठा कि 2013 या 2018 का संविधान अस्तित्व में नहीं है. ऐसे में अब आयोग कैसे कह सकता है कि वह इसे स्वीकार नहीं करेगा.
इस पर सीजेआई ने पूछा कि क्या अनुच्छेद 11ए जनवरी 2013 में चुनाव आयोग को भेजा गया था और क्या उस दस्तावेज पर हस्ताक्षर की पुष्टि की जा सकती है? बेंच ने यह भी पूछा कि हटाने का प्रस्ताव सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित था या नहीं? सिब्बल ने कहा कि उसे पक्ष प्रमुख ने मंजूरी दी थी और संविधान पीठ पहले ही दस्तावेजों को वैध मान चुकी है. उपस्थिति पत्रक से भी स्पष्ट है कि कौन-कौन बैठक में मौजूद था.
सिब्बल ने पूर्व सीजेआई जस्टिस चंद्रचूड़ की अगुआई में पांच जजों की संविधान पीठ के निर्णय का भी हवाला दिया. उन्होंने विधायक दल द्वारा पारित प्रस्ताव भी पढ़ा जिसके तहत सुनील प्रभु की जगह भरत गोगावले को चीफ व्हिप नियुक्त किया गया था. Supreme Court ने माना कि ये प्रस्ताव गलत और अमान्य थे, क्योंकि यह राजनीतिक दल का निर्णय नहीं था. विधायक दल का कोई गुट मुख्य सचेतक चीफ व्हिप को बदलने का प्रयास नहीं कर सकता था. डिप्टी स्पीकर ने हमारी बात स्वीकार कर ली थी, लेकिन फिर सरकार बदल गई. इसके बाद सदन के नए स्पीकर ने माना कि गोगावले ही मुख्य सचेतक थे. इस अदालत ने माना कि स्पीकर का यह निर्णय गैरकानूनी था. स्पीकर यह निर्णय नहीं ले सकते थे.
सिब्बल ने कहा कि गुजरात में मौजूद 39 विधायकों के एक गुट से पारित प्रस्ताव को मान्यता नहीं दी जा सकती थी. उस प्रस्ताव को राज्यपाल के पास भेजा गया. इसके कारण बाद में सरकार गिर गई. ये गलत था. इसमें गंभीर विसंगति थी. सिब्बल ने अदालत को 22 जून 2022 को बुलाई गई बैठक से पहले उद्धव ठाकरे के कई नोटिस के बारे में बताया.
सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल ने कहा कि कोई भी निर्णय ‘राजनीतिक दल’ को लेना चाहिए न कि विधायक दल को. यदि पार्टी के भीतर कोई प्रतिद्वंद्विता है तो वे इसमें ‘विधायक दल’ को बीच में कैसे ला रहे हैं?
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एससीएच/एबीएम