
चंडीगढ़, 9 जुलाई . फिल्म ‘सतलुज’ को लेकर शुरू हुए विवाद के बीच शिरोमणि अकाली दल के वरिष्ठ नेता दलजीत सिंह चीमा की प्रतिक्रिया सामने आई है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का समर्थन करते हुए चीमा कहा कि यदि कोई फिल्म ऐतिहासिक तथ्यों और न्यायालय द्वारा स्थापित घटनाओं पर आधारित है, तो उसे प्रदर्शित होने से नहीं रोका जाना चाहिए. लोकतंत्र में लोगों को सच्चाई जानने और स्वयं निर्णय लेने का अधिकार मिलना चाहिए.
दलजीत सिंह चीमा ने कहा कि शिरोमणि अकाली दल का रुख इस मुद्दे पर पूरी तरह स्पष्ट है. देश में फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन का सम्मान होना चाहिए और किसी भी रचनात्मक अभिव्यक्ति पर अनावश्यक प्रतिबंध नहीं लगाया जाना चाहिए. यदि किसी ऐतिहासिक घटना पर आधारित फिल्म बनाई गई है और उससे जुड़े मामलों में Supreme Court तक अपना निर्णय दे चुका है, तो ऐसी फिल्म को रोकने का कोई औचित्य नहीं बनता. जिन लोगों को जसवंत सिंह खालड़ा के अपहरण और उनकी हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया, उनकी सजा को Supreme Court ने भी बरकरार रखा है और कई दोषियों को उम्रकैद की सजा मिल चुकी है. ऐसे में यदि इन्हीं तथ्यों के आधार पर फिल्म बनाई गई है, तो उसे दर्शकों तक पहुंचने दिया जाना चाहिए.
उन्होंने आरोप लगाया कि यदि सरकार किसी फिल्म को सिनेमाघरों में प्रदर्शित नहीं होने देती, तो यह सेंसरशिप का एक रूप है. चूंकि फिल्म ओटीटी प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध है, इसलिए अधिक से अधिक लोगों को इसे देखना चाहिए ताकि वे स्वयं तथ्यों को समझ सकें और अपनी राय बना सकें. देश में हर विषय पर सेंसरशिप लगाने की प्रवृत्ति ठीक नहीं है.
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि पहले भी ‘द कश्मीर फाइल्स’, ‘द केरला स्टोरी’ समेत कई विवादित विषयों पर आधारित फिल्में आई हैं और उन पर व्यापक चर्चा हुई. ऐसे में केवल ‘सतलुज’ को अलग नजरिए से देखना उचित नहीं है. चीमा ने कहा कि जनता को यह अवसर मिलना चाहिए कि वह स्वयं देखे कि उस दौर में क्या हुआ था, किसकी क्या भूमिका रही और किसने अत्याचार किए. अंतिम फैसला जनता को ही करना चाहिए, न कि सरकार को.
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पीएसके