दुष्‍कर्म मामला: नारायण साईं को Supreme Court से बड़ा झटका, हाईकोर्ट के आदेश में दखल से इनकार

नई दिल्ली, 7 अगस्त . Supreme Court ने शुक्रवार को दुष्‍कर्म मामले में खुद को भगवान बताने वाले आसाराम के बेटे नारायण साईं की सजा पर रोक लगाने से इनकार करने वाले गुजरात हाईकोर्ट के आदेश में दखल देने से मना कर दिया.

हालांकि, कोर्ट ने गुजरात हाईकोर्ट से अनुरोध किया कि वह सजा के खिलाफ उसकी आपराधिक अपील पर तीन महीने के अंदर फैसला करने की कोशिश करे.

जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की बेंच ने साईं की विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) का निपटारा करते हुए गुजरात हाईकोर्ट से अनुरोध किया कि वह उसकी लंबित अपील पर जल्द से जल्द, और हो सके तो तीन महीने के अंदर सुनवाई करके फैसला करे.

Supreme Court में दायर अपनी एसएलपी में, साईं ने गुजरात हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें अपील के निपटारे तक सजा पर रोक और जमानत की मांग करने वाली उसकी लगातार पांचवीं अर्जी को खारिज कर दिया गया था.

इस साल 4 मई को दिए अपने आदेश में, गुजरात हाई कोर्ट ने कहा था कि “हमारे लिए यह मानना ​​मुश्किल है कि दोषी के बरी होने की अच्छी संभावना है” और उसकी सजा पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था. कोर्ट ने कहा था कि जब किसी व्यक्ति को गंभीर अपराध का दोषी ठहराया जाता है, तो “उसके निर्दोष होने की धारणा खत्म हो जाती है”.

लंबे समय से जेल में बंद होने के आधार पर साईं की दलील को खारिज करते हुए, हाई कोर्ट ने यह भी कहा था कि अपील के निपटारे में हुई देरी के लिए वह खुद जिम्मेदार है, क्योंकि उसने अंतिम सुनवाई पर जोर देने के बजाय बार-बार जमानत की अर्जियां लगाईं. जस्टिस इलेश जे. वोरा और जस्टिस आरटी वछानी की बेंच ने कहा था, “रिकॉर्ड में है कि आरोपी अपील की सुनवाई के लिए कभी तैयार नहीं होता. दोषी ने खुद ही अपनी लंबी जेल की स्थिति पैदा की है.”

हाई कोर्ट ने आगे कहा कि साईं “अपनी अपील की जल्द सुनवाई में बिल्कुल भी दिलचस्पी नहीं रखता” और देरी करने वाले तरीके अपनाकर और बार-बार अर्जियां दाखिल करके उसने खुद को विशेष राहत पाने के अधिकार से वंचित कर लिया है.

साईं को सूरत की एक ट्रायल कोर्ट ने 30 अप्रैल, 2019 को एक महिला भक्त के साथ बार-बार यौन उत्पीड़न करने के मामले में दोषी ठहराया था. उन्हें भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की विभिन्न धाराओं, जिनमें धारा 376(2)(सी) (बलात्कार) और 377 (अप्राकृतिक अपराध) शामिल हैं, के तहत दोषी ठहराया गया और उम्रकैद की सजा सुनाई गई. सभी सजाएं एक साथ चलेंगी.

अभियोजन पक्ष के अनुसार, पीड़िता 2001 में सूरत आश्रम में आयोजित धार्मिक प्रवचनों के दौरान नारायण साईं के संपर्क में आई थी. उसने आरोप लगाया कि 2001 और 2004 के बीच बिहार, सूरत और गंभोई के विभिन्न आश्रमों में साईं ने उसका यौन उत्पीड़न किया और बार-बार उसका शोषण किया. अभियोजन पक्ष के मुताबिक, साईं के पिता आसाराम की इसी तरह के यौन उत्पीड़न के मामले में गिरफ्तारी के बाद हिम्मत जुटाकर पीड़िता ने अक्टूबर 2013 में एफआईआर दर्ज कराई थी.

गुजरात हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के इस निष्कर्ष को स्वीकार किया कि पीड़िता का बयान भरोसेमंद था और साईं तथा उनके पिता का अपने अनुयायियों पर जो प्रभाव था, उसे देखते हुए एफआईआर दर्ज करने में हुई देरी का कारण संतोषजनक ढंग से स्पष्ट किया गया था.

फरार रहने के बाद दिसंबर 2013 में दिल्ली पुलिस ने नारायण साईं को पंजाब-हरियाणा सीमा के पास से गिरफ्तार किया था और बाद में उन्हें दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई गई.

एएसएच/पीएम