
वाशिंगटन, 30 जून . औद्योगिक नेताओं के अनुसार, भारत की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के लिए अगले 25 सालों में ऊर्जा की मांग को तीन गुना तक बढ़ाना होगा, जिससे अमेरिका के साथ निवेश, तकनीकी साझेदारी और ऊर्जा सहयोग के लिए दुनिया के सबसे बड़े मौकों में से एक बनेगा.
ऊर्जा सुरक्षा और इंफ्रास्ट्रक्चर पर अमेरिका-भारत रणनीतिक साझेदारी फोरम (यूएसआईएसपीएफ) लीडरशिप समिट पैनल में एक्सॉनमोबिल के आर्थिक और ऊर्जा निदेशक डॉ. प्रसन्ना जोशी ने कहा कि भारत के विकास की रफ्तार हर बड़ी अर्थव्यवस्था से अलग है.
डॉ. जोशी ने कहा, “हमारा अनुमान है कि अगले 25 सालों में वैश्विक जीडीपी असल में दोगुनी हो जाएगी, जबकि भारत की जीडीपी लगभग सात से आठ गुना बढ़कर 25 से 30 ट्रिलियन डॉलर हो जाएगा. अगले 25 सालों में ऊर्जा की डिमांड सिर्फ 12 से 15 फीसदी बढ़ने की उम्मीद है. भारत के लिए, यह संख्या तीन गुना है.”
उन्होंने कहा कि भारत के बड़े ग्रोथ प्लान के लिए पूरी ऊर्जा वैल्यू चेन में बड़े निवेश की जरूरत होगी.
जोशी ने कहा कि भारत को ऊर्जा सुरक्षा बनाए रखने और आर्थिक विकास का समर्थन करते हुए भविष्य की डिमांड को पूरा करने के लिए हर उपलब्ध ऊर्जा सोर्स की जरूरत होगी.
उन्होंने बताया कि भारत की इंस्टॉल्ड बिजली बनाने की क्षमता अभी लगभग 500 गीगावाट है, और देश का लॉन्ग-टर्म लक्ष्य इसे 2047 तक लगभग 2,100 गीगावाट तक बढ़ाना है. अकेले नवीकरणीय ऊर्जा में ही निवेश के बहुत सारे अवसर हैं.
उन्होंने कहा, “सोलर और विंड के लिए अनुमान है 100 गीगावाट को लगभग 1,800 गीगावाट तक ले जाना होगा. भारत में निवेश और सहयोग के बहुत सारे मौके हैं.”
साथ ही, डॉ. जोशी ने इस बात पर जोर दिया कि पारंपरिक ऊर्जा स्रोत अहम भूमिका निभाते रहेंगे और कहा, “भारत के सिर्फ 10 फीसदी स्रोतकी ही खोज हुई है. ज्यादा खोज से भारत की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी.”
उन्होंने यह भी कहा कि अभी भारत के ऊर्जा मिक्स में प्रकृतिक गैस का हिस्सा लगभग 6 फीसदी है और देश का मकसद नए इंफ्रास्ट्रक्चर, एक्सप्लोरेशन और लॉन्ग-टर्म निवेश के जरिए इसे 2047 तक 12 से 15 फीसदी के बीच बढ़ाना है.
एक्सकोल एनर्जी एंड रिसोर्सेज के अध्यक्ष और सीईओ अर्नी थ्रैशर ने कहा कि भारत अमेरिकी कोयला एक्सपोर्ट के लिए सबसे बड़ा विदेशी मार्केट बन गया है.
थ्रैशर ने कहा, “एक डेस्टिनेशन के तौर पर भारत अमेरिकी एक्सपोर्ट कोयले का सबसे बड़ा उपभोक्ता है. अभी यह अमेरिकी कोयला एक्सपोर्ट का लगभग 23 फीसदी है.”
उन्होंने कहा कि एक्सपोर्ट 2005 में एक मिलियन टन से बढ़कर पिछले साल 21.5 मिलियन टन हो गया है. तो यह बढ़ोतरी बहुत बढ़िया है.
थ्रैशर ने कहा कि कोई भी एक सोर्स भारत की तेजी से बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा नहीं कर सकता. आज भारत और दुनिया को हर तरह की ऊर्जा की जरूरत है. सिर्फ एक तरह की ऊर्जा से दुनिया की ऊर्जा और बिजली की जबरदस्त मांग पूरी नहीं होने वाली है.
उन्होंने अंडरग्राउंड माइनिंग, कोल गैसीफिकेशन, बैटरी स्टोरेज और दूसरी एनर्जी टेक्नोलॉजी में अमेरिकी कंपनियों के लिए मौकों की ओर भी इशारा किया. दोनों स्पीकर्स ने कहा कि भारत दुनिया के सबसे बड़े लॉन्ग-टर्म निवेश के मौके देता है.
डॉ. जोशी ने कहा कि भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर के विस्तार के लिए सरकारों, व्यवसायों और टेक्नोलॉजी प्रोवाइडर्स के बीच सहयोग की जरूरत है. उन्होंने कहा, “यह कोई एक कंपनी नहीं कर सकती. आपको पूरी वैल्यू चेन में मिलकर काम करना होगा. भारत की सबसे बड़ी ताकत उसका घरेलू मार्केट है. भारत की ग्रोथ अंदरूनी तौर पर होगी; हम भारत के कंज्यूमर बेस का इस्तेमाल कर सकते हैं.”
अर्नी थ्रैशर ने कहा कि निवेश को लॉन्ग-टर्म अप्रोच अपनाना चाहिए. हमें ऊर्जा में निवेश करने के लिए लंबा समय चाहिए और हमें कॉस्ट को उस स्तर पर रखने पर फोकस करना होगा जो भारतीय अर्थव्यवस्था कर सकती है.”
उन्होंने कहा कि सस्ती ऊर्जा महत्वपूर्ण बनी रहेगी क्योंकि भारत अपनी बड़ी आबादी के लिए जीवन स्तर को ऊपर उठाना जारी रखेगा.
यह चर्चा वाशिंगटन में नौवें यूएसआईएसपीएफ नेतृत्व शिखर सम्मेलन के दौरान हुई, जिसमें व्यापार, ऊर्जा, प्रौद्योगिकी और रणनीतिक क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर चर्चा करने के लिए भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के वरिष्ठ सरकारी अधिकारी, राजनयिक और व्यापारिक नेता एक साथ आए.
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केके/पीएम