
कोलकता, 1 अगस्त . पश्चिम बंगाल के भाजपा प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने प्रसिद्ध लेखिका और कवयित्री तस्लीमा नसरीन के कोलकाता लौटने पर कहा कि उनका स्वागत है. प्रसिद्ध लेखिका शुक्रवार को करीब 19 साल बाद लौटीं.
कोलकाता में से बातचीत में समिक भट्टाचार्य ने कहा कि तस्लीमा नसरीन सिर्फ एक लेखिका या कवयित्री नहीं हैं. उन्होंने बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हुए अत्याचारों को जनता के सामने रखा. सीपीएम सरकार ने उनके सभी उपन्यासों पर एक ही वजह से प्रतिबंध लगाया था, जिससे उनका वोट बैंक सुरक्षित रह सके. हालांकि, बाद में कांग्रेस ने भी यही तरीका अपनाया. इसके बाद की सरकार ने भी यह रवैया अपनाया था.
उन्होंने कहा कि हमने राज्यसभा में यह मुद्दा उठाया था कि तस्लीमा नसरीन को पश्चिम बंगाल आने की इजाजत क्यों नहीं दी जानी चाहिए. वह बांग्ला बोलती हैं, बांग्ला में कविताएं लिखती हैं और बांग्ला उपन्यास लिखती हैं, इसलिए उन्हें आने की इजाजत मिलनी चाहिए.
भट्टाचार्य ने संत रविदास का जिक्र करते हुए कहा कि भारतीय भक्ति आंदोलन के महान संतों में से एक, संत शिरोमणि रविदास, आज भी समानता, मानवता और सामाजिक न्याय के एक अनोखे प्रतीक के रूप में याद किए जाते हैं. पंद्रहवीं सदी में, उन्होंने जाति-भेद, छुआछूत और सामाजिक असमानता के खिलाफ मजबूती से आवाज उठाई थी कि इंसान की असली पहचान उसके जन्म से नहीं, बल्कि उसके कर्मों से होती है.
उन्होंने आगे बताया कि वाराणसी के पास सीर गोवर्धनपुर में एक मोची परिवार में जन्मे संत रविदास ने अपनी आजीविका के लिए जूते बनाने का काम जारी रखा, और साथ ही आम लोगों की भाषा में भक्ति, मानवता, समानता और सामाजिक सद्भाव का संदेश भी फैलाया. उनके द्वारा परिकल्पित बेगमपुरा एक ऐसे समाज का सपना था, जहां असमानता, डर या शोषण के लिए कोई जगह न हो, जहां न्याय, सम्मान और समान अधिकार हों. उनकी कई रचनाओं को सिख धर्म के पवित्र ग्रंथ ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ में शामिल किया गया है, जो उनके आध्यात्मिक और मानवतावादी दर्शन की सार्वभौमिक स्वीकार्यता का प्रमाण है. संत रविदास द्वारा स्थापित सामाजिक न्याय, मानवीय गरिमा और भाईचारे के आदर्श आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, और ये आदर्श हमें न्याय पर आधारित और समावेशी समाज बनाने की राह पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं.
दूसरी ओर, तस्लीमा नसरीन के कोलकाता वापसी पर केंद्रीय राज्यमंत्री सुकांत मजूमदार ने कहा कि तस्लीमा नसरीन यहां आ सकती हैं. अगर उनके पास वीजा है, तो वह कहीं भी जा सकती हैं. वह भारत आ सकती हैं, वह पश्चिम बंगाल आ सकती हैं. पश्चिम बंगाल भारत से बाहर नहीं है. अगर उनके पास वैध वीजा है, तो उन्हें यहां आने का अधिकार है.
बताते चलें कि साल 2007 में पश्चिम बंगाल में बुद्धदेव भट्टाचार्य के कार्यकाल के दौरान राजधानी के कुछ इलाकों में हुई हिंसा के कारण तस्लीमा नसरीन को कोलकाता छोड़ना पड़ा था. यह हिंसा उनकी पुस्तक ‘द्विखंडितो’ के कारण भड़की थी.
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डीकेएम/एबीएम