शिवसेना विवाद : Supreme Court में शिंदे गुट ने उद्धव ठाकरे की पार्टी के दावों को बताया गलत, 15 सितंबर को अगली सुनवाई

नई दिल्ली, 2 सितंबर . महाराष्ट्र की सियासत के सबसे बड़े मामलों में से एक, उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे के बीच शिवसेना पार्टी के नाम और चुनाव निशान पर अधिकार को लेकर दायर याचिका पर बुधवार को Supreme Court की बेंच ने सुनवाई की. इस दौरान शिंदे गुट ने उद्धव ठाकरे की पार्टी के दावों को गलत बताया और अपनी दलील रखने के लिए कम से कम चार घंटे का समय मांगा. इस मामले की अगली सुनवाई 15 सितंबर को होगी.

इस मामले की सुनवाई सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच कर रही है. चुनाव आयोग ने एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट को असली शिवसेना के रूप में मान्यता दी थी और तीर-कमान का निशान भी दिया था. इसी फैसले को उद्धव ठाकरे ने Supreme Court में चुनौती दी है.

Supreme Court में एकनाथ शिंदे गुट की ओर से वरिष्ठ वकील नीरज किशन कौल ने दलीलें रखीं. उन्होंने कई अहम तर्क दिए. पहला तर्क उन्होंने आंतरिक लोकतंत्र को लेकर दिया. उन्होंने कहा, “क्या एक जिम्मेदार राजनीतिक दल को केवल इसलिए आंतरिक चुनावों से बचना चाहिए क्योंकि इसमें धन का लेन-देन हो सकता है? धांधली या गड़बड़ी का समाधान उसे सुधारना चाहिए, न कि चुनावों को खत्म करना. इस बात की भी कोई गारंटी नहीं है कि जो व्यक्ति चुनाव जीतने के लिए पैसे देने को तैयार है, वह पद पाने के लिए पैसे नहीं देगा.”

दूसरा तर्क यह था कि सभी वरिष्ठ पदों के लिए चुनाव होते हैं. निचले स्तर के पदों पर मौजूद लोग केवल ऊपर से आए फैसले और नीतियां लागू करते हैं, इसलिए उन्हें चुने जाने की आवश्यकता नहीं है. लेकिन, अगर चुनाव किसी के लिए भी आवश्यक हैं, तो वे उन लोगों के लिए हैं जो जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं के सीधे संपर्क में रहते हैं. वे जनता की नब्ज समझते हैं, मतदाताओं से सीधी बातचीत करते हैं और पार्टी को फीडबैक देते हैं जो पार्टी की नीतियों और घोषणापत्र को आकार देता है. उन्हें केवल ‘फैसले लागू करने वाले’ कहकर खारिज नहीं किया जा सकता, जिन्हें चुनावी जनादेश की आवश्यकता नहीं है.

वकील नीरज कौल ने कहा कि निर्वाचन आयोग हर समय हर पार्टी के रोजमर्रा के क्रियाकलापों पर नजर नहीं रख सकता. और जब देख ले तो चुप भी नहीं रह सकता. अधिकतर मान्यता प्राप्त दल अपने संविधान के मुताबिक आंतरिक लोकतंत्र बनाए रखते हैं, इसका ब्योरा जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा 39 में दिया गया है. निर्वाचन आयोग ने सभी राजनीतिक दलों को अपने संविधान रिकॉर्ड पर रखने का निर्देश दिया था. इसके बाद शिवसेना का संविधान 1999 में आयोग को दिया गया था. बालासाहेब ठाकरे के 2012 में निधन के बाद पार्टी ने संवैधानिक ढांचा मौलिक रूप से बदल दिया.

शिंदे गुट ने कहा कि ठाकरे गुट की ओर से यह भ्रामक तर्क दिया गया है कि ‘पक्ष प्रमुख’ का पद केवल 2018 के संविधान के तहत अस्तित्व में आया था. हर कोई उस पद से जुड़ी शक्तियों से अवगत था. यह तथ्यात्मक रूप से गलत है. शिवसेना के संस्थापक बालासाहेब ठाकरे के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए 2013 में ‘शिवसेना प्रमुख’ का पद फ्रीज कर दिया गया था, इसके बाद ‘पक्ष प्रमुख’ का पद बनाया गया था. ठाकरे गुट की कई दलीलें तथ्यात्मक रूप से गलत हैं.

किशन कौल ने कहा कि सुनवाई चलते हुए दस दिन हो गए हैं. मुझे कम से कम चार घंटे चाहिए. दो घंटे तो अयोग्यता मामले पर दलीलें रखने के लिए ही चाहिए.

अब इस मामले की अगली सुनवाई 15 सितंबर को दोपहर दो बजे होगी.

एससीएच/एबीएम