
काठमांडू, 30 अगस्त . नेपाल में भीषण बाढ़ और भूस्खलन के बाद राहत एवं बचाव अभियान जारी है. देश के पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के विदेश नीति सलाहकार रहे राजन भट्टराई के मुताबिक बचाव अभियान दल के सामने सबसे बड़ी चुनौती सुरंग में फंसे लोगों को बचाना है. से खास बातचीत में उन्होंने कहा कि रसुवा जिले में हाइड्रोपावर परियोजना की सुरंग में लोगों को सुरक्षित बाहर निकालने की कोशिश की जा रही है.
भट्टराई ने कहा, “त्रासदी के पांच दिन हो गए हैं. अभी भी बड़ी संख्या में लोगों के सुरंग के भीतर फंसे होने की आशंका है. ऐसे में उन्हें जीवित बाहर निकालना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता बनी हुई है. बचाव अभियान के सामने पहली चुनौती उन लोगों को सुरक्षित निकालना है, जिनके सुरंग के अंदर होने की आशंका है. सुरंग से उन्हें बाहर निकालना सबसे बड़ी चुनौती बन गया है.”
भट्टराई के मुताबिक, नेपाल सरकार ने इस मुश्किल अभियान में मदद के लिए अपने पड़ोसी देशों भारत और चीन से भी विशेषज्ञों तथा अन्य आवश्यक सहयोग उपलब्ध कराने का अनुरोध किया है, ताकि सुरंग में फंसे लोगों को जीवित बाहर निकाला जा सके.
उन्होंने आगे कहा, “दूसरी चुनौती रसुवा की है. बहुत लोग अभी भी वहां हैं, उनके पास घर नहीं है. कुछ तीर्थयात्री हैं. कल ही वो लोग वहां से निकल पाए क्योंकि आपदा के बाद सड़क मार्ग तबाह हो चुके थे. बागमती प्रशासन ने कुछ सड़कों का निर्माण कराया. इस वजह से करीब 2000 लोग वहां से निकल पाए.”
अन्य चुनौतियों का जिक्र करते हुए उन्होंने आगे कहा, “मेरे सूत्रों ने बताया कि उच्च स्थानों पर गंभीर रूप से घायल हैं इसलिए वो निकल नहीं पा रहे हैं. हमारे पास हेलीकॉप्टर पर्याप्त नहीं है; ये भी एक चुनौती है. फिर शवों का निपटान, घायलों का उपचार, और लोगों को आश्रय देना प्रमुख चुनौतियां हैं.”
राहत और बचाव अभियान की प्राथमिकताओं के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि प्राथमिकता लोगों की जान बचाना है. उन्होंने कहा कि जो लोग अभी भी सुरंग के अंदर, रासुवा जिले के जंगलों में या अन्य दुर्गम इलाकों में फंसे हैं, उन्हें खोजकर सुरक्षित निकालना जरूरी है. इसके साथ ही घायल लोगों को तत्काल बुनियादी चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराना भी बेहद जरूरी है.
नेपाल में आपदा प्रबंधन और पूर्व चेतावनी व्यवस्था पर भट्टराई ने कहा, “हमारे पास इतनी मजबूत पूर्व चेतावनी प्रणाली नहीं है. जो प्रणाली थी, वह भी इस बार बाढ़ में बह गई. इस बार बाढ़ और नुकसान का पैमाना अकल्पनीय था. हमारे विशेषज्ञों ने भी पहले इस तरह की स्थिति का अनुमान नहीं लगाया था. चीनी और भारतीय विशेषज्ञ भी इस स्तर की आपदा की कल्पना नहीं कर सके थे.”
उन्होंने कहा कि नेपाल, भारत और चीन के बीच आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में सहयोग को और मजबूत करने की जरूरत है, क्योंकि प्राकृतिक आपदाएं सीमाओं तक सीमित नहीं रहतीं.
वहीं, आपदा के पांचवें दिन भी राहत और बचाव अभियान को लेकर संतोष व्यक्त नहीं किया जा सकता. भट्टराई ने कहा कि हजारों लोगों के अब भी लापता होने की आशंका है और यह पता लगाना एक बड़ी चुनौती है कि वे कहां हैं.
भट्टराई ने कहा, “यह पांचवां दिन है, लेकिन हम यह नहीं कह सकते कि हम संतुष्ट हैं. अभी भी बड़ी संख्या में, हजारों लोग लापता हैं. किसी को पता नहीं है कि वे कहां हैं और उन्हें कैसे खोजा जाए. बड़ी संख्या में लोग बुनियादी जरूरतों से वंचित हैं. वे पांच दिनों से खुले आसमान के नीचे हैं और उनके पास जीवित रहने तथा वहां से आगे बढ़ने के लिए जरूरी चीजें नहीं हैं.”
उन्होंने स्पष्ट किया कि मौजूदा परिस्थितियों में राहत और बचाव कार्य को पर्याप्त नहीं माना जा सकता.
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केआर/