‘सत्ता का चक्र स्थायी नहीं’, अभिषेक बनर्जी पर हमले के बाद भाजपा पर भड़के आरजेडी सांसद

नई दिल्ली, 31 मई . तृणमूल कांग्रेस के सांसद अभिषेक बनर्जी पर हुए हमले को लेकर राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के सांसद मनोज झा ने भारतीय जनता पार्टी पर निशाना साधा है. उन्होंने कहा कि सत्ता का चक्र स्थायी नहीं है. आना-जाना इसका चरित्र है. अगर इसमें ऐसी छवियां देखेंगी तो देश सांस नहीं ले पाएगा.

अभिषेक बनर्जी पर हुए हमले पर प्रतिक्रिया देते हुए सांसद मनोज झा ने से कहा, “मेरा मानना ​​है कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है और ऐसी घटनाएं लोकतंत्र को शर्मसार करती हैं. पूरे चुनाव के दौरान, मैंने लिखा भी था और बार-बार कहा भी था कि बंगाल के चुनाव हिंसा के एक ऐसे दौर की ओर बढ़ रहे हैं, जैसा पहले कभी नहीं देखा गया.”

उन्होंने कहा कि भाषाई हिंसा ही वास्तविक हिंसा को जन्म देती है और उसके लिए स्वीकार्यता व औचित्य पैदा करती है. उन्होंने कहा, “कुछ दोस्त कह रहे हैं कि तृणमूल कांग्रेस के दौर में भी ऐसी चीजें हुई थीं. लेकिन क्या इससे वह सही साबित हो जाता है? अगर तब ऐसा हुआ था, तो वह भी गलत था और आज जो हो रहा है, वह भी गलत है.”

मनोज झा ने यह भी कहा कि हमारे लोकतंत्र में भाषाई और वास्तविक हिंसा की कोई जगह नहीं है. पक्ष-विपक्ष सभी को बैठना होगा, क्योंकि सत्ता का चक्र स्थायी नहीं है. आना-जाना इसका चरित्र है. अगर इसमें ऐसी छवियां देखेंगी तो देश सांस नहीं ले पाएगा.

इस दौरान, नीट और सीबीएसई परीक्षाओं से जुड़े मुद्दे उठाते हुए मनोज झा ने पीएम मोदी के ‘मन की बात’ कार्यक्रम पर प्रतिक्रिया दी. उन्होंने कहा, “सिर्फ भाषणों से कुछ हासिल नहीं होगा. प्रधानमंत्री भाषण देते हैं, लेकिन सिर्फ भाषण काफी नहीं हैं. ठोस काम की जरूरत है. आप ठोस काम करने में नाकाम रहे हैं. आपने ‘एग्जाम वॉरियर’ नाम की एक किताब लिखी और पूरे परीक्षा सिस्टम को एक तरह का युद्ध का मैदान बना दिया.”

आरजेडी सांसद ने कहा कि ‘वॉरियर’ शब्द खुद ‘वॉर’ (युद्ध) से आया है, इसलिए आपने हर किसी को एक टकराव वाली मानसिकता में घसीट लिया है. उन्होंने कहा, “असल समस्या यह है कि आपके सिस्टम और ढांचों में ही कमियां हैं, जहां आपने अपने ही लोगों को बिठा रखा है. उनमें शिक्षा, सीखने और अकादमिक मामलों को लेकर कोई समझ और संवेदना नहीं है.”

मनोज झा ने आगे कहा कि ‘मन की बात’ में सिर्फ एक तरफ संवाद करने से बात नहीं बनेगी. उन्हें उन लाखों बच्चों से बात करनी चाहिए, तब शायद पता चलेगा कि वह पीड़ा सिर्फ एक बच्चे की नहीं है, बल्कि पूरे परिवार की है.

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