
नई दिल्ली, 27 मई . याचिकाकर्ता और राजनीतिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव ने एसआईआर पर Supreme Court के फैसले की योगेंद्र यादव ने आलोचना की है. वहीं, भाजपा ने बुधवार को विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के संबंध में Supreme Court के फैसले पर सवाल उठाने वाली टिप्पणियों की कड़ी आलोचना की. भाजपा ने कहा कि शीर्ष अदालत पर यह आरोप लगाना कि उसने अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी छोड़ दी है, ‘लापरवाह, गैर-जिम्मेदाराना और संस्थाओं पर विश्वास को कमजोर करने वाला’ है.
यह प्रतिक्रिया Supreme Court द्वारा चुनाव आयोग के एसआईआर कराने के फैसले को बरकरार रखने के बाद आई है. शीर्ष अदालत ने कहा था कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण चुनाव आयोग के संवैधानिक और वैधानिक अधिकार क्षेत्र में आता है और इसका उद्देश्य चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता और शुद्धता बनाए रखना है.
फैसले की आलोचना पर प्रतिक्रिया देते हुए भाजपा आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने शीर्ष अदालत का बचाव किया और कहा कि न्यायिक फैसलों की आलोचना लोकतांत्रिक और संवैधानिक सीमाओं के भीतर ही होनी चाहिए.
उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, ”यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि Supreme Court के समक्ष एक याचिकाकर्ता ने प्रतिकूल फैसले के बाद देश की सर्वोच्च संवैधानिक अदालत पर आरोप लगाए हैं. किसी को फैसले से असहमति हो सकती है, उसकी तर्कसंगत आलोचना की जा सकती है या कानूनी तरीके से पुनर्विचार याचिका दायर की जा सकती है, यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है लेकिन अदालत को यह कहना कि उसने अपनी जिम्मेदारी छोड़ दी या जानबूझकर मताधिकार छीनने में भूमिका निभाई, लापरवाह और गैर-जिम्मेदाराना है.”
अमित मालवीय ने यह टिप्पणी याचिकाकर्ता और राजनीतिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव की आलोचना के जवाब में की, जिन्होंने Supreme Court के फैसले पर सवाल उठाए थे.
भाजपा नेता ने कहा कि Supreme Court ने सभी पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनने के बाद यह निर्णय दिया है. उन्होंने कहा, ”Supreme Court ने सभी पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनने के बाद एसआईआर की संवैधानिकता को सही ठहराया है. इस फैसले को सिर्फ इसलिए पहले से तय बताकर खारिज कर देना कि यह किसी की राजनीतिक या वैचारिक स्थिति से मेल नहीं खाता, न सिर्फ कोर्ट का, बल्कि संवैधानिक प्रक्रिया का भी अपमान है.”
अमित मालवीय ने कहा, ”और भी अधिक आश्चर्य की बात यह है कि याचिकाकर्ता खुद को लोकतंत्र और नैतिकता का एकमात्र संरक्षक बताने की कोशिश कर रहे हैं. यह दिखावा शायद तभी गंभीर लगता जब यह किसी ऐसे व्यक्ति से आता जिसके पास बौद्धिक ईमानदारी और संस्थाओं के प्रति सम्मान का रिकॉर्ड हो.”
उन्होंने कहा कि संस्थाओं की आलोचना की आड़ में उन पर अविश्वास पैदा करने की कोशिश नहीं होनी चाहिए. उन्होंने कहा, ”संस्थाओं की आलोचना का अधिकार उन्हें कमजोर करने का अधिकार नहीं देता, खासकर तब जब फैसले उनके पक्ष में न हों.”
उन्होंने कहा, ”भारत का लोकतंत्र उन स्वयंभू सुधारकों की निराशा से कहीं अधिक मजबूत है जो मानते हैं कि हर संस्था तभी वैध है जब वह उनके अनुसार फैसला दे.”
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एएमटी/पीएम