
मुंबई, 4 अगस्त . भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति कमेटी (आरबीआई-एमपीसी) बुधवार को आने वाले निर्णय में ब्याज दरों को यथावत रख सकती है. इसकी वजह महंगाई का निर्धारित लक्ष्य के नीचे होना और आर्थिक विकास पर फोकस होना है. यह जानकारी मंगलवार को एक्सपर्ट्स की ओर से दी गई.
मौजूदा समय में देश में खुदरा महंगाई की दर आरबीआई द्वारा तय सीमा 2-6 प्रतिशत के बीच है और केंद्रीय बैंक अर्थव्यवस्था में कीमतों में स्थिरता के साथ विकास सुनिश्चित करने के लिए इस रेंज के बीच के 4 प्रतिशत के स्तर को अपना लक्ष्य मानता है.
जून में भारत की खुदरा महंगाई दर 4.38 प्रतिशत तक पहुंच गई. इसकी मुख्य वजह वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी और उत्पादन में इस्तेमाल होने वाली कुछ आयातित चीजों का महंगा होना था. सरकारी तेल कंपनियों ने ग्राहकों को बचाने के लिए कच्चे तेल की कीमतों में हुई बढ़ोतरी का ज्यादातर बोझ खुद उठाया है.
आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने संकेत दिया है कि मॉनेटरी पॉलिसी रिव्यू कमेटी ब्याज दरों में बढ़ोतरी तभी करेगी जब महंगाई का दबाव व्यापक हो जाए, न कि सिर्फ आपूर्ति में अस्थायी रुकावटों की वजह से हो.
जून में आरबीआई के आर्थिक अनुमान के मुताबिक, 31 मार्च, 2027 को खत्म होने वाले वित्त वर्ष के लिए खुदरा महंगाई दर 5.1 प्रतिशत रहने की उम्मीद है, जबकि विकास दर 6.6 प्रतिशत रहने का अनुमान है. ये अनुमान इस धारणा पर आधारित थे कि कच्चे तेल की औसत कीमत लगभग 95 डॉलर प्रति बैरल रहेगी. कच्चे तेल की कीमतें इस स्तर से नीचे रही हैं, इसलिए इन अनुमानों के सही साबित होने की उम्मीद है.
खाड़ी देशों पर निर्भरता कम करने के लिए भारत ने जुलाई में रूस से रियायती कीमतों पर 50 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल आयात किया है, जिससे कीमतों को काबू में रखने में मदद मिली है. इसी तरह, सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों ने अपने एलपीजी आयात का 70 प्रतिशत से अधिक हिस्सा अमेरिका से मंगाना शुरू कर दिया है.
कुछ विशेषज्ञों का मानना था कि आरबीआई को ब्याज दरें बढ़ाकर गिरते रुपए को सहारा देना चाहिए ताकि वैश्विक निवेशकों से अधिक विदेशी मुद्रा आकर्षित की जा सके.
हालांकि, आरबीआई के कुछ कदमों—जैसे भारतीय सरकारी बॉन्ड रखने वाले विदेशी निवेशकों के लिए कैपिटल-गेन्स टैक्स खत्म करना और अनिवासी भारतीयों (एनआरआई) के लिए डॉलर जमा योजनाओं को अधिक आकर्षक बनाना—से रुपए को स्थिर करने के लिए लगभग 40 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा प्रवाह आकर्षित करने में सफलता मिली है.
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एबीएस