
अहमदाबाद, 12 अगस्त . अमेरिका की न्यूयॉर्क ईस्टर्न डिस्ट्रिक्ट कोर्ट द्वारा अमेरिकी न्याय विभाग (डीओजे) के आपराधिक मामले को स्थायी रूप से खारिज किए जाने के दो दिन बाद अदाणी समूह के चेयरमैन गौतम अदाणी ने कहा कि पिछले लगभग दो वर्षों के अनुभव ने उन्हें और अधिक विनम्र बनाया है. उन्होंने कहा कि इस पूरे दौर ने उनके इस विश्वास को और मजबूत किया कि व्यक्ति को अपनी सच्चाई पर दृढ़ रहना चाहिए और न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान करते हुए धैर्य एवं गरिमा के साथ उसे पूरा होने देना चाहिए.
भारत के 80वें स्वतंत्रता दिवस समारोह की तैयारियों के तहत आयोजित ‘अपनी बात, अपनों के साथ’ कार्यक्रम के दूसरे संस्करण में गौतम अदाणी ने समूह के 700 से अधिक स्थानों पर जुड़े तीन लाख से अधिक कर्मचारियों और साझेदारों को संबोधित किया. इस दौरान उन्होंने वर्ष 2023 में सामने आए हिंडनबर्ग रिसर्च के आरोपों और उसके बाद शुरू हुई कानूनी प्रक्रिया का उल्लेख किया, लेकिन उनका मुख्य संदेश संकटों से अधिक उन मूल्यों पर केंद्रित रहा, जो कठिन समय में किसी संस्थान को मजबूती प्रदान करते हैं.
गौतम अदाणी ने अपने जीवन की शुरुआती यात्रा को याद करते हुए कहा कि 16 वर्ष की उम्र में घर छोड़कर मुंबई आने और शून्य से कारोबार खड़ा करने के अनुभव ने उन्हें सिखाया कि विश्वास न तो मांगा जा सकता है और न ही विरासत में मिलता है. इसे केवल चरित्र, निरंतरता और अपने वचन को निभाने के जरिए अर्जित किया जाता है.
उन्होंने भारतीय पौराणिक कथा ‘समुद्र मंथन’ का उदाहरण देते हुए कहा कि किसी व्यक्ति, संस्थान या राष्ट्र की हर महत्वपूर्ण यात्रा कठिन परिस्थितियों और चुनौतियों से होकर गुजरती है. उन्हीं परिस्थितियों में उसकी वास्तविक ताकत सामने आती है.
अदाणी ने कहा कि हिंडनबर्ग रिपोर्ट के बाद समूह द्वारा लिया गया एक महत्वपूर्ण निर्णय इसी सोच का परिणाम था. उन्होंने बताया कि समूह कानूनी रूप से अपने 20,000 करोड़ रुपए के पूर्ण रूप से सब्सक्राइब्ड फॉलो-ऑन पब्लिक ऑफर (एफपीओ) को आगे बढ़ा सकता था, लेकिन इसके बावजूद निवेशकों का पैसा वापस लौटाने का फैसला किया गया. उनके अनुसार यह फैसला किसी कानूनी अधिकार के उपयोग से अधिक निवेशकों के भरोसे की रक्षा करने के लिए लिया गया था.
उन्होंने कहा कि यह सीख उन्हें अपने पिता से मिली थी कि विश्वास किसी भी कानूनी अधिकार से बड़ा होता है. निवेशकों की पूंजी लौटाने का निर्णय इसी सिद्धांत पर आधारित था.
अमेरिकी न्याय विभाग से जुड़े मामले के निष्कर्ष को लेकर गौतम अदाणी ने कहा कि इस प्रक्रिया ने कानून के शासन में उनके विश्वास को और मजबूत किया है. उन्होंने इसे केवल कानूनी जीत नहीं, बल्कि नेतृत्व, जिम्मेदारी और धैर्य को समझने की एक महत्वपूर्ण यात्रा बताया.
हालांकि उन्होंने कहा कि इस पूरे दौर में सबसे अधिक प्रभावित करने वाली चीज अदालत की कार्यवाही नहीं, बल्कि उनके साथ काम करने वाले लोगों का शांत और अटूट समर्पण था. जब मामला वैश्विक सुर्खियों में था, तब भी कर्मचारियों, श्रमिकों, आपूर्तिकर्ताओं, ठेकेदारों, विक्रेताओं और साझेदारों ने अपने कार्यों को पूरी प्रतिबद्धता के साथ जारी रखा.
उन्होंने कहा कि इंजीनियरों ने परियोजनाओं पर काम जारी रखा, टीमों ने निष्पादन पर ध्यान बनाए रखा और समूह के विभिन्न व्यवसायों में संचालन निर्बाध रूप से चलता रहा. अदाणी ने इस सामूहिक संकल्प को समूह की सबसे बड़ी ताकत बताया.
इस प्रतिबद्धता का प्रभाव समूह के कारोबारी प्रदर्शन में भी दिखाई दिया. अदाणी समूह का पूंजीगत व्यय (कैपेक्स) पिछले वर्ष 1.53 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया, जो भारतीय कॉरपोरेट जगत में सबसे बड़े निवेशों में से एक था. समूह ने बंदरगाह, हवाई अड्डे, लॉजिस्टिक्स, नवीकरणीय ऊर्जा, ट्रांसमिशन, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में निवेश जारी रखा.
हालांकि गौतम अदाणी ने कहा कि केवल वित्तीय आंकड़े ही किसी संगठन की पूरी कहानी नहीं बताते. उनके अनुसार, उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि और गर्व का विषय ‘अदाणी परिवार’ है, जिसमें समूह से जुड़े लाखों लोग शामिल हैं.
अपने संबोधन में उन्होंने आम लोगों के प्रति भी आभार व्यक्त किया. उन्होंने कहा कि देश भर में कई ऐसे लोग उनसे मिले जिन्हें वह व्यक्तिगत रूप से नहीं जानते थे, लेकिन उन्होंने आगे बढ़कर उनका उत्साह बढ़ाया, हाथ मिलाया या अपने समर्थन का संकेत दिया.
अदाणी ग्रुप के चेयरमैन ने आलोचकों का भी उल्लेख किया और कहा कि कठिन सवालों ने आत्ममंथन का अवसर दिया. उनके मुताबिक, आलोचना ने संगठन को और अधिक जिम्मेदार एवं जमीन से जुड़ा रहने की प्रेरणा दी.
भारत की स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर यानी 2047 की ओर देखते हुए उन्होंने कर्मचारियों और साझेदारों से एक प्रश्न पूछने का आग्रह किया कि हमारी पीढ़ी को किस लिए याद किया जाएगा? उन्होंने कहा कि भारत का मूल्यांकन केवल उसके द्वारा बनाई गई अवसंरचना से नहीं होगा, बल्कि उन अवसरों, मजबूत समुदायों और मूल्यों से भी होगा जिन्हें देश विकसित करेगा.
अपने संबोधन के अंत में गौतम अदाणी ने कहा कि किसी संस्थान की पहचान केवल इस बात से नहीं बनती कि उसने कितने संकटों का सामना किया, बल्कि इस बात से बनती है कि उसने उन संकटों के दौरान किन मूल्यों की रक्षा की.
उन्होंने कहा कि ‘विकसित भारत’ की यात्रा में देश की सबसे बड़ी विरासत केवल भौतिक अवसंरचना नहीं होगी, बल्कि ऐसे संस्थान होंगे जो विश्वास अर्जित करें, चुनौतियों का सामना करें और आने वाली पीढ़ियों को पहले से बेहतर भविष्य सौंपें.
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डीबीपी