
नई दिल्ली, 14 सितंबर . हिंदी, सांस्कृतिक और जमीन से जुड़ी हुई ऐसी भाषा है, जिसमें कई स्थानीय भाषाओं को खुद में समेटा हुआ है. उर्दू भाषा ने हिंदी को कई खूबसूरत, प्रभावी और संवेदनशील शब्द दिए हैं, जिसके बिना हिंदी अधूरी लगती है. उर्दू की वजह से हिंदी में शायरी, गजल और नज्मों की एक शानदार परंपरा मजबूत हुई, जिसने भावनाओं को व्यक्त करने के नए रास्ते खोले. कबीर और अमीर खुसरो से लेकर आधुनिक काल तक, बोलचाल और लोक-साहित्य में दोनों ने एक-दूसरे को सींचा है.
19वीं सदी तक बोलचाल में दोनों भाषाओं (हिंदी, उर्दू) का लगभग एक समान प्रयोग किया जाता था, लेकिन हिंदी बहुसंख्यक लोगों में ज्यादा बोली जाने लगी. हिंदी ने देवनागरी लिपि को अपनाया, जो देश की बहुसंख्यक आबादी की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ी थी.
हिंदी साहित्य ने ब्रज, अवधी, मैथिली, राजस्थानी और भोजपुरी जैसी समृद्ध लोक बोलियों की विरासत को अपने साथ जोड़ा, जिससे इसकी जड़ें गांवों और आमजन तक पहुंचीं. प्रेमचंद जैसे महान रचनाकार ने शुरुआत उर्दू से की, लेकिन बाद में हिंदी को ही अपने बड़े उपन्यासों (जैसे गोदान) और कथा-साहित्य का मुख्य माध्यम बनाया, जिससे हिंदी गद्य का फलक तेजी से विस्तृत हुआ.
आचार्य रामचंद्र शुक्ल और हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे मनीषियों ने हिंदी में जिस प्रकार की गहन आलोचना, इतिहास-लेखन और सांस्कृतिक निबंध-परंपरा को खड़ा किया, उसने वैचारिक स्तर पर हिंदी को एक मजबूत आधार दिया. शिक्षा और पठन-पाठन में हिंदी के बढ़ते प्रयोग के कारण इसका पाठक वर्ग और प्रकाशन उद्योग तेजी से आगे बढ़ा.
भारतेंदु हरिश्चद्र को आधुनिक हिंदी साहित्य का पितामह कहा जाता है. हिंदी साहित्य में उनका बहुत बड़ा और क्रांतिकारी योगदान रहा है. गद्य के लिए उन्होंने खड़ी बोली को मुख्य आधार बनाया था. ‘कवि वचन सुधा,’ ‘हरिश्चंद्र मैगजीन’ और ‘हिंदी प्रदीप’ जैसी पत्रिकाओं से समाज में वैचारिक क्रांति आई. इस युग में भारतेंदु हरिश्चद्र, बालकृष्ण भट्ट, और प्रताप नारायण मिश्र जैसे साहित्यकारों ने बड़ी भूमिका निभाई.
हिंदी साहित्य में द्विवेदी युग का भी बड़ा योगदान रहा है. आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने खड़ी बोली को व्याकरण से शुद्ध करके मुख्य काव्य भाषा बनाया था. इसी समय गद्य और पद्य दोनों में खड़ी बोली का एक समान और स्पष्ट रूप स्थापित हुआ था. महावीर प्रसाद द्विवेदी, मैथिलीशरण गुप्त, अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ जैसे साहित्यकारों ने बड़ी भूमिका निभाई थी.
हिंदी साहित्य में छायावाद युग को हिंदी कविता का स्वर्ग युग कहा जाता है. इस काल ने हिंदी काव्य को इतिवृत्तात्मकता (वर्णनात्मकता) से निकालकर आत्मानुभूति, कल्पना और सौंदर्य के ऊंचे शिखरों पर पहुंचाया. जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा इस युग में प्रमुख स्तंभ रहे. सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जैसे कवियों ने पारंपरिक बंधनों को तोड़कर हिंदी में मुक्त छंद (केंचुवा छंद) का सूत्रपात किया. कविता में राजा-महाराजाओं की वंदना छोड़कर व्यक्तिगत प्रेम, सौंदर्य बोध, वेदना, और करुणा को मुख्य स्वर बनाया गया.
हिंदी साहित्य में प्रगतिवाद युग काफी क्रांतिकारी रहा. इस युग में हिंदी भाषा सीधे सड़क, खेत-खलिहान और जनसाधारण के वास्तविक जीवन से जुड़ी. इस दौरान समाज की कड़वी सच्चाइयों, विसंगतियों तथा समस्याओं को खुलकर खुलकर सामने रखा गया. आम लोगों को आसानी से समझने के लिए कठिन और संस्कृतनिष्ठ शब्दावली के बजाय प्रगतिवादी कवियों ने सहज, सरल और बोलचाल के करीब की भाषा को अपनाया. मुंशी प्रेमचंद, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल और रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जैसे साहित्यकारों ने जनमानस की चेतना का संवाहक बनाया.
प्रयोगवाद युग के दौरान साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं को पुरानी रूढ़ियों, अति-भावुकता और नारेबाजी से निकालकर नए जीवन-सत्य और आधुनिक बोध से जोड़ा था. इस युग के कवियों ने वास्तविक और सच्चे अनुभवों को रचना के केंद्र में रखा. अज्ञेय, गिरिजाकुमार माथुर और भारतभूषण अग्रवाल जैसे साहित्यकारों ने लोगों को आधुनिक बोध से जोड़ा.
नई कविता युग ने पारंपरिक और आदर्शवादी विषयों को छोड़कर जीवन की वास्तविक सच्चाइयों, मध्यमवर्गीय आदमी की विडंबनाओं, कुंठाओं और संघर्षों को वाणी दी. इस दौरान पारंपरिक छंदों और तुकबंदी के बंधनों को तोड़कर मुक्त छंद, बातचीत की सी सहज भाषा और नए प्रतीकों का प्रयोग किया गया. सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’, मुक्तिबोध, धर्मवीर भारती, भवानी प्रसाद मिश्र और नरेश मेहता जैसे साहित्यकारों लोगों के सरोकार से जुड़ी रचनाएं रचीं.
आधुनिक काल हिंदी साहित्य का सबसे विकसित, व्यापक और परिवर्तनकारी युग माना जाता है. इस काल में साहित्य ने केवल मनोरंजन का माध्यम होने की भूमिका से आगे बढ़कर समाज, राष्ट्र, व्यक्ति और मानवता की समस्याओं को अभिव्यक्ति देने का कार्य किया. आधुनिक युग में राष्ट्रीय चेतना, सामाजिक सुधार, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, लोकतांत्रिक मूल्यों, स्त्री-विमर्श, दलित चेतना, किसान एवं श्रमिक जीवन तथा व्यक्ति-स्वातंत्र्य जैसे विषय साहित्य के केंद्र में आए. यही कारण है कि इस काल को हिंदी साहित्य का स्वर्ण युग भी कहा जाता है.
इसी काल में खड़ी बोली हिंदी साहित्यिक भाषा के रूप में स्थापित हुई तथा हिंदी गद्य का व्यवस्थित विकास हुआ. नाटक, उपन्यास, कहानी, निबंध, आलोचना, संस्मरण, आत्मकथा, रेखाचित्र, रिपोर्ताज और पत्रकारिता जैसी आधुनिक गद्य-विधाओं का विकास भी इसी युग की प्रमुख उपलब्धि है. कविता के क्षेत्र में भी भारतेन्दु युग, द्विवेदी युग, छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नई कविता, अकविता तथा समकालीन कविता जैसी अनेक साहित्यिक धाराओं का उदय हुआ, जिससे हिंदी साहित्य को नई संवेदना और वैचारिक गहराई मिली.
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एसडी/वीसी