
नई दिल्ली, 14 अगस्त . भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने शुक्रवार को बताया कि उसने खाद्य कारोबार संचालकों (एफबीओ) के लिए खाद्य उत्पादों की लेबलिंग, डिस्प्ले, विज्ञापन और दावों से जुड़े नियमों पर एक विशेष प्रशिक्षण सत्र आयोजित किया. यह प्रशिक्षण सत्र ऐसे समय में की गई है जब पैकेज्ड फूड उत्पादों पर पोषण संबंधी जानकारी और वार्निंग लेबल को लेकर सार्वजनिक स्वास्थ्य और उपभोक्ता जागरूकता पर व्यापक चर्चा चल रही है और एफएसएसएआई देश भर में खाद्य सुरक्षा मानकों के गंभीर उल्लंघन को लेकर खाद्य व्यवसाय संचालकों के खिलाफ लगातार कार्रवाई कर रहा है.
एफएसएसएआई ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जानकारी देते हुए बताया कि ‘अंडरस्टैंडिंग लेबलिंग एंड डिस्प्ले एंड एडवरटाइजिंग एंड क्लेम्स रेगुलेशंस’ विषय पर आयोजित इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में बड़ी संख्या में खाद्य उद्योग से जुड़े प्रतिनिधियों ने भाग लिया. प्राधिकरण के अनुसार, कार्यक्रम में उद्योग की सक्रिय भागीदारी यह दर्शाती है कि खाद्य कंपनियां लेबलिंग और विज्ञापन नियमों के अनुपालन को लेकर गंभीरता दिखा रही हैं.
यह प्रशिक्षण ऐसे समय आयोजित किया गया है जब अधिक चीनी, नमक और संतृप्त वसा वाले पैकेज्ड खाद्य उत्पादों पर स्पष्ट पोषण संबंधी चेतावनी लेबल लगाने की मांग तेज हो रही है. उपभोक्ता संगठनों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि पैकेजिंग के सामने वाले हिस्से पर स्पष्ट चेतावनी देने से उपभोक्ताओं को स्वस्थ विकल्प चुनने में मदद मिलेगी.
हाल ही में Supreme Court ने भी इस मुद्दे पर केंद्र सरकार और एफएसएसएआई से सवाल पूछे थे. शीर्ष अदालत ने पैकेज्ड खाद्य उत्पादों पर फ्रंट-ऑफ-पैक वार्निंग लेबल लागू करने में हो रही देरी पर चिंता जताई और कहा कि विशेष रूप से बच्चों के स्वास्थ्य के मामले में कोई समझौता नहीं किया जा सकता.
न्यायमूर्ति जे.बी. पारडीवाला और के. विनोद चंद्रन की पीठ ने सरकार से पूछा था कि मजबूत पोषण चेतावनी प्रणाली लागू करने की दिशा में अब तक क्या कदम उठाए गए हैं. अदालत ने यह भी जानना चाहा कि क्या उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य को पर्याप्त प्राथमिकता दी जा रही है.
Supreme Court ने सुनवाई के दौरान कहा था कि खाद्य पैकेट के सामने स्पष्ट और सहज दिखने वाली चेतावनियां उपभोक्ताओं को खरीदारी से पहले सोच-समझकर निर्णय लेने में मदद कर सकती हैं.
अदालत का मानना है कि लोगों को यह जानकारी आसानी से उपलब्ध होनी चाहिए कि किसी उत्पाद में चीनी, नमक या वसा की मात्रा अधिक है या नहीं.
सुनवाई के दौरान अदालत ने उन तर्कों पर भी सवाल उठाए थे जिनमें कहा गया था कि कड़े वार्निंग लेबल से खाद्य उत्पाद निर्माताओं के कारोबार पर असर पड़ सकता है. अदालत ने स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा था कि अंतिम निर्णय उपभोक्ता का होता है और व्यावसायिक हितों को सार्वजनिक स्वास्थ्य से ऊपर नहीं रखा जा सकता.
शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार से प्रस्तावित लेबलिंग ढांचे का पूरा विवरण मांगा था और जवाब दाखिल करने के लिए समय दिया था. साथ ही अदालत ने संकेत दिया था कि यदि ठोस प्रगति नहीं दिखाई गई तो वह आगे आवश्यक निर्देश जारी कर सकती है.
एक पूर्व सुनवाई में केंद्र सरकार ने कहा था कि अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप पैकेजिंग और पोषण चेतावनी प्रणाली लागू करने में व्यावहारिक चुनौतियां हैं. हालांकि Supreme Court ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया और कहा कि भारत सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा के उपायों में देरी के लिए विदेशी मानकों का हवाला नहीं दे सकता.
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डीबीपी