मैं जजों की गलतियों के लिए शुक्रगुजार हूं, आप इसे भगवान की कृपा कह सकते हैं: ईशा सिंह

टोयोटा, 28 सितंबर . भारतीय निशानेबाज ईशा सिंह ने कहा कि सोमवार को आइची-नागोया एशियन गेम्स 2026 में महिलाओं की 25 मीटर पिस्टल स्पर्धा के फाइनल के दौरान आई अप्रत्याशित बाधाएं आखिरकार उनके पक्ष में रहीं. उन्होंने स्वीकार किया कि इन रुकावटों ने उन्हें बढ़ते दबाव और थकान से उबरने का जरूरी समय दिया, जिसकी बदौलत वे सिल्वर मेडल जीतने में सफल रहीं.

21 वर्षीय ईशा आठवें स्थान पर क्वालीफाई करने के बाद फाइनल में पहुंची थीं. उन्होंने एक उतार-चढ़ाव भरे मेडल राउंड का सामना किया, जिसमें कई शूट-ऑफ, तकनीकी रुकावटें और गोल्ड मेडल के लिए चीन की शियाओ जियारुइक्सुआन के साथ लंबी टक्कर शामिल रही.

फाइनल शूट-ऑफ के बाद ईशा दूसरे स्थान पर रहीं, लेकिन उन्होंने कहा कि यह अनुभव मेडल से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण था. ईशा ने ‘ ’ से बात करते हुए कहा, “यह अद्भुत था और मुझे पहले कभी ऐसा अनुभव नहीं हुआ. यह निश्चित रूप से मेरे अद्भुत अनुभवों की सूची में शामिल होगा. मैं हर पल के लिए आभारी हूं. हालांकि, यह घबराहट पैदा करने वाला था, फिर भी यह अद्भुत था.”

भारतीय शूटर ने माना कि फाइनल के दौरान कई बार वह बाहर होने की कगार पर थीं. अच्छी शुरुआत के बावजूद, ईशा को मुकाबले में बने रहने के लिए बार-बार संघर्ष करना पड़ा, लेकिन आखिरकार उन्होंने ब्रॉन्ज मेडल की पोजिशन हासिल की और फिर गोल्ड मेडल शूट-ऑफ में जगह बनाई.

उन्होंने कहा, “एक एथलीट के तौर पर मुझे इस बात का अच्छी तरह पता है कि खेलते समय क्या होता है. बेशक, मन में ध्यान भटकाने वाले विचार आते हैं. जैसे, ‘मैं किसी भी पल बाहर हो सकती हूं.’ शुरुआत में मैं आगे चल रही थी, लेकिन चीजें वैसी नहीं हो रही थीं जैसा मैं चाहती थी. फिर भी मैंने अपना ध्यान बनाए रखा. मुझे पता था कि मैं यह कर सकती हूं. मैंने पूरे दिल से संघर्ष किया. मैंने अपनी पूरी कोशिश की. मेरा हाथ थोड़ा थक गया था क्योंकि गोल्ड मेडल के लिए मुकाबला करने वाले किसी भी अन्य खिलाड़ी ने उतने शॉट नहीं लगाए जितने मैंने लगाए थे. मगर फिर भी मुझे लगता है कि मुझे इस पर काम करना होगा, क्योंकि मैं नहीं चाहती कि ऐसा दोबारा हो. हां, मुझे लगता है कि कुल मिलाकर मैं जिस तरह से खेली, उससे बहुत खुश हूं.”

ईशा ने बताया कि जैसे-जैसे फाइनल आगे बढ़ा, शारीरिक थकान एक अहम कारक बन गई. मुकाबले के तनाव भरे पलों के दौरान, वह बार-बार अपना शूटिंग वाला हाथ हिला-डुला रही थी, ताकि उस जकड़न को कम कर सके जो शुरू में महसूस ही नहीं हुई थी.

ईशा ने कहा, “मुझे लगता है कि यह दबाव की वजह से था. मुझे लगता है कि इस बार, मेरे मन में पता नहीं यह सिर्फ मेरा ख्याल था या सच में ऐसा हो रहा था, लेकिन बिना मुझे पता चले ही मेरा हाथ सचमुच बहुत ज्यादा जकड़ रहा था और थक रहा था. यहां तक कि पहली सीरीज में ही. इसी कारण मैंने बस उसे थोड़ा आराम देने या रिलैक्स करने की कोशिश की. मैं जजों की गलतियों के लिए शुक्रगुजार थी, क्योंकि मुझे थोड़ा आराम मिल गया. शायद आप इसे भगवान की कृपा कह सकते हैं कि मुझे थोड़ा समय मिला और सोचने का मौका मिला. ऐसा लगता है कि यह ऐसी स्थिति है जहां एथलीट का ‘जोन’ (एकाग्रता का लय) टूट जाता है. मगर मेरे मामले में, इसने सचमुच मेरी मदद की.”

उन्होंने कहा कि क्वालिफिकेशन और फाइनल के दौरान महसूस हुए दबाव ने उन्हें पहले आई मुश्किलों की याद दिलाई, लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि अब वह ऐसे पलों को संभालने के लिए बेहतर ढंग से तैयार महसूस करती हैं.

ईशा ने कहा, “हां, क्वालिफिकेशन पर मुझे गर्व नहीं है. हालांकि, मुझे लगता है कि ऐसा दबाव मैंने पहले कभी महसूस नहीं किया था. मैं कहूंगी कि यह ओलंपिक स्तर का दबाव था. इसी वजह से मैं कह रही हूं कि मुझे इस मैच का पूरा अनुभव बहुत पसंद आया, क्योंकि मुझे उस पल को फिर से जीने का मौका मिला. मैंने वो चीजें कीं जो मैं उस समय नहीं कर पाई थी. मुझे लगता है कि अब मैं सच में ज्यादा मजबूत महसूस कर रही हूं, क्योंकि क्वालिफिकेशन में भी, रैपिड राउंड में, मैं कम से कम आखिरी सीरीज में वापसी कर पाई, जो मैं प्रिसिजन राउंड में नहीं कर पाई थी. मुझे लगता है कि फाइनल के लिए भी मैं बहुत कॉन्फिडेंट थी और मुझे पता था कि मैं यह कर सकती हूं.”

उस तुलना के बारे में विस्तार से बताते हुए ईशा ने कहा कि मुश्किल ओलंपिक के दौरान अपने ड्यूलिंग (आमने-सामने की शूटिंग) पर कंट्रोल खोने में थी. एक ऐसी समस्या रही है, जिसका सामना उन्हें आइची-नागोया में भी करना पड़ा.

उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि मैं अपने ओलंपिक अनुभव के बारे में बात करने की कोशिश कर रही थी, क्योंकि यह कुछ-कुछ वैसी ही स्थिति थी. मेरी ड्यूलिंग बिल्कुल कंट्रोल से बाहर हो गई थी. मैं चीजों को संभाल नहीं पा रही थी. ऐसी ही स्थिति का सामना मुझे यहां बहुत लंबे समय बाद करना पड़ा. वरना सब कुछ ठीक चल रहा था. जब सब कुछ ठीक चल रहा होता है, तो आपको किसी चीज पर काम करने की जरूरत नहीं होती. इस बार ऐसा ही हुआ. तभी मुझे लगा कि मैंने सच में बहुत मेहनत की है. मुझे लगता है कि पिछले सीजन ने मुझे यह एहसास दिलाया कि मैं इसे संभालने के लिए काफी मजबूत हूं.”

ईशा ने दर्शकों की तरफ से मिल रहे सपोर्ट के बारे में भी बात की. उन्होंने कहा कि फाइनल के दौरान वह अपने पिता की आवाज सुन सकती थीं और रुकावटों के बाद अधिकारियों के प्रति उनकी निराशा को समझ सकती थीं.

उन्होंने कहा, “मैं हमेशा अपने पापा की आवाज सुन सकती हूं. मुझे लगता है कि वे जजों से बहुत नाराज थे. मैं उनकी बात समझती हूं. मगर हां, शायद मैं इस बारे में थोड़ा बाद में सोचूंगी. मैं इसे ठीक से जाहिर नहीं कर सकती, क्योंकि यह ऐसा खेल नहीं है जहां आप गुस्सा दिखा सकें. आपको सच में शांत रहना पड़ता है. असल में यही मुश्किल बात है.”

ईशा ने आगे कहा, “दूसरे खेलों में आप कम से कम गेंद को जोर से फेंक सकते हैं या ऐसा कुछ कर सकते हैं. हालांकि, यहां आप ऐसा नहीं कर सकते. आपको जितना हो सके शांत रहना पड़ता है. तो हां, मुझे लगता है कि मैं इस बारे में थोड़ा बाद में सोचूंगी, लेकिन मुझे लगता है कि उनका रिएक्शन सही था. जजों से ऐसी गलतियां नहीं होनी चाहिए. मगर हो सकता है कि यह कोई इलेक्ट्रॉनिक गड़बड़ रही हो. मुझे अभी पता नहीं है. पर ठीक है. ऐसी चीजें होती रहती हैं.”

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एसएम/एएस