
नई दिल्ली, 14 अगस्त . शेयर बाजार में सूचीबद्ध होने की तैयारी कर रही ई-कॉमर्स लॉजिस्टिक्स और शिपिंग प्लेटफॉर्म शिपरॉकेट ने अपने ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस (डीआरएचपी) में कंपनी और उसकी सहयोगी इकाइयों से जुड़े कई लंबित कानूनी और कर विवादों का खुलासा किया है. ये मामले संभावित निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं, क्योंकि वे कंपनी के जोखिम प्रोफाइल और भविष्य के कारोबारी प्रभावों को लेकर सवाल खड़े करते हैं.
डीआरएचपी के अनुसार, शिपरॉकेट वर्तमान में चार आपराधिक मामलों का सामना कर रही है, जिनमें कुल दावा राशि 5.39 करोड़ रुपए है. इसके अलावा कंपनी के खिलाफ दो अन्य आपराधिक कार्यवाहियां और सात कर (टैक्स) विवाद भी लंबित हैं. वहीं कंपनी की सहयोगी इकाइयों (सब्सिडियरी) के खिलाफ एक आपराधिक मामला और तीन कर संबंधी मामले चल रहे हैं, जिनमें कुल दावा राशि 2.34 करोड़ रुपए बताई गई है.
कंपनी के आईपीओ ड्राफ्ट पेपर में एक महत्वपूर्ण मामले का भी उल्लेख किया गया है, जो वर्ष 2022 में दर्ज किया गया था. इस मामले में शिपरॉकेट के सह-संस्थापक साहिल गोयल और गौतम कपूर, निदेशक अर्जुन सेठी तथा मुख्य वित्तीय अधिकारी कुमार तनमय को नामजद किया गया है. इस केस में धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात, जालसाजी और आपराधिक साजिश जैसे आरोप लगाए गए हैं. मामला फिलहाल अदालत में लंबित है और इस पर अंतिम फैसला आना बाकी है.
वित्तीय प्रदर्शन की बात करें तो डीआरएचपी के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में शिपरॉकेट का शुद्ध घाटा 79.2 करोड़ रुपए रहा, जो वित्त वर्ष 2024-25 के 74.4 करोड़ रुपए के घाटे से थोड़ा अधिक है. हालांकि कंपनी ने यह भी बताया कि यह स्थिति वित्त वर्ष 2023-24 की तुलना में काफी बेहतर है, जब उसे 595.1 करोड़ रुपए का भारी घाटा हुआ था.
राजस्व के मोर्चे पर कंपनी ने मजबूत वृद्धि दर्ज की है. वित्त वर्ष 2025-26 में परिचालन से प्राप्त आय 24 प्रतिशत बढ़कर 2,024.1 करोड़ रुपए हो गई. यह वृद्धि दर पिछले वित्त वर्ष के समान रही, जिससे कंपनी के कारोबार के विस्तार की गति बनी रहने का संकेत मिलता है.
इसके बावजूद लाभप्रदता अभी भी कंपनी के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है. शिपरॉकेट ने अपने दस्तावेजों में कहा है कि व्यापारियों के आधार का विस्तार, नए उत्पादों का विकास, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) क्षमताओं में निवेश और उभरते व्यवसायों के विस्तार पर हो रहे खर्च निकट भविष्य में कंपनी की कमाई पर दबाव बनाए रख सकते हैं.
कंपनी की एक और महत्वपूर्ण निर्भरता तीसरे पक्ष की सेवा प्रदाताओं पर है. वित्त वर्ष 2025-26 में मर्चेंट सॉल्यूशन लागत कंपनी के कुल खर्च का लगभग 69.4 प्रतिशत हिस्सा थी. इसके अलावा कंपनी के शीर्ष 10 विक्रेताओं का योगदान इन खर्चों में 55 प्रतिशत से अधिक रहा, जिससे यह जोखिम पैदा होता है कि यदि इन सेवा प्रदाताओं के साथ संबंध प्रभावित होते हैं, तो कंपनी के संचालन और लागत पर असर पड़ सकता है.
शिपरॉकेट ने यह भी बताया कि उसके अधिकांश लॉजिस्टिक्स साझेदारों के साथ कोई विशेष समझौता नहीं है. ऐसे में उसे बढ़ती परिचालन लागत, सेवा बाधाओं और प्रतिस्पर्धी प्लेटफॉर्म्स को प्राथमिकता दिए जाने जैसे जोखिमों का सामना करना पड़ सकता है.
कंपनी जिस क्षेत्र में काम करती है, वहां प्रतिस्पर्धा भी काफी ज्यादा है. शिपरॉकेट को ई-कॉमर्स मार्केटप्लेस, लॉजिस्टिक्स कंपनियों और विभिन्न टेक्नोलॉजी एग्रीगेटर्स से प्रतिस्पर्धा मिलती है. साथ ही कंपनी अपने क्रॉस-बॉर्डर कारोबार का विस्तार करना चाहती है, जहां विकास की संभावनाएं तो हैं, लेकिन संचालन और विस्तार से जुड़े जोखिम भी मौजूद हैं.
इन चुनौतियों के बावजूद कंपनी अंतरराष्ट्रीय और घरेलू ई-कॉमर्स लॉजिस्टिक्स बाजार में अपनी मौजूदगी बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है. निवेशकों की नजर अब इस बात पर रहेगी कि कंपनी भविष्य में लाभप्रदता हासिल करने और परिचालन जोखिमों को कम करने के लिए क्या कदम उठाती है.
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