
नई दिल्ली, 27 जुलाई . पश्चिम एशिया संकट के कारण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में आई बाधाओं के बीच सरकार ने ऊर्जा सहित महत्वपूर्ण औद्योगिक कच्चे माल की उपलब्धता सुनिश्चित करने, इनपुट लागत के दबाव को कम करने, व्यापार को सुगम बनाने, औद्योगिक गतिविधियों को समर्थन देने और व्यापक आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए कई कदम उठाए हैं. यह जानकारी सरकार की ओर से सोमवार को संसद में दी गई.
सरकार ने चुनिंदा पेट्रोकेमिकल फीडस्टॉक पर अस्थायी रूप से सीमा शुल्क में छूट प्रदान की. इसके अलावा, कारोबारों को समर्थन देने के लिए भारत मैरीटाइम इंश्योरेंस पूल रिलीफ योजना शुरू की गई.
निर्यातित उत्पादों पर शुल्क एवं कर वापसी योजना (आरओडीटीईपी) के लाभों को भी बहाल किया गया, ताकि बढ़ी हुई माल ढुलाई, बीमा और युद्ध जोखिम लागत के प्रभाव को कम किया जा सके. साथ ही, इमरजेंसी क्रेडिट लाइन गारंटी स्कीम (ईसीएलजीएस) 5.0 के माध्यम से तरलता (लिक्विडिटी) सहायता भी उपलब्ध कराई गई.
वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने लोकसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में कहा कि सरकार मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) और व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौतों (सीईपीए) के नेटवर्क का विस्तार कर व्यापारिक लचीलापन भी मजबूत कर रही है.
उन्होंने बताया कि ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए कच्चे तेल के आयात स्रोतों में विविधता, रणनीतिक साझेदारियों का विस्तार, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार में वृद्धि, वैकल्पिक ईंधनों को बढ़ावा, महत्वपूर्ण ऊर्जा संसाधनों के घरेलू उत्पादन और कोयला एवं लिग्नाइट गैसीकरण योजना जैसे कदम उठाए गए हैं. इसके अलावा, एलपीजी उपभोक्ताओं को पीएनजी अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर ऊर्जा उपयोग को अधिक कुशल बनाने की दिशा में भी प्रयास किए गए हैं.
सरकार ने गैस की सुनिश्चित आपूर्ति, आयात स्रोतों में विविधता, अग्रिम खरीद और बफर स्टॉक बनाए रखकर उर्वरकों तथा अन्य आवश्यक कृषि इनपुट की पर्याप्त उपलब्धता भी सुनिश्चित की है.
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि पश्चिम एशिया में हाल के भू-राजनीतिक घटनाक्रमों का वैश्विक स्तर पर प्रतिकूल असर पड़ा है, जिसका सबसे अधिक प्रभाव कच्चे तेल का आयात करने वाली उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ा है. इस संघर्ष के कारण अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि हुई, जिससे भारत का कच्चे तेल का आयात बिल भी बढ़ा.
हालांकि, भारतीय कच्चे तेल की औसत बास्केट कीमत अप्रैल 2026 में 114.5 डॉलर प्रति बैरल से घटकर जुलाई 2026 (22 जुलाई तक) में 77.6 डॉलर प्रति बैरल रह गई है. कच्चे तेल की कीमतों में यह गिरावट, सेवा निर्यात में लगातार वृद्धि और प्रवासी भारतीयों से मिलने वाले रेमिटेंस के साथ मिलकर भारत के बाह्य क्षेत्र को समर्थन देगी और चालू खाते पर दबाव कम करेगी.
चौधरी ने कहा कि सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा हाल में घोषित उपायों से पूंजी प्रवाह बढ़ने की उम्मीद है, जिससे भारत की बाहरी वित्तपोषण आवश्यकताओं को पूरा करने में मदद मिलेगी.
इन समन्वित उपायों से भारत की व्यापक आर्थिक स्थिरता मजबूत होगी, महंगाई के दबाव को नियंत्रित रखने में सहायता मिलेगी और वैश्विक ऊर्जा बाजार में व्यवधानों का भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव न्यूनतम रहेगा.
उन्होंने आगे कहा कि वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही के हाई-फ्रीक्वेंसी संकेतक आर्थिक गतिविधियों और घरेलू मांग में निरंतर मजबूती का संकेत दे रहे हैं.
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एबीएस